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बच्चों का इंटरनेट का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा, और प्लेटफॉर्म को अब क्या करना होगा

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट तक पहुंच बच्चों समेत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, और बाल यौन शोषण सामग्री हटाने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का आदेश दिया। यह अधिकार कहां से आता है, किस चीज़ पर रोक लगाता है, और परिवारों व टेक कंपनियों के लिए क्या बदलता है।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

15 अक्टूबर के आदेश में जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन ने कहा कि इंटरनेट तक पहुंचने और उसे इस्तेमाल करने का अधिकार अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(ए) से निकलता है, और बच्चों को भी यह अधिकार है। प्लेटफॉर्म अगर शोषण सामग्री नहीं हटाते, तो इस आधार पर बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखने वाली रोक की इजाज़त नहीं है, हालांकि पैरेंटल कंट्रोल या 'चाइल्ड मोड' जैसे संतुलित उपाय ठीक हैं। कोर्ट ने केंद्र से बाल यौन शोषण सामग्री का नेशनल हैश एंड यूआरएल लिस्ट डेटाबेस बनाने को कहा, प्लेटफॉर्म की सामग्री हटाने और शिकायत निवारण की ज़िम्मेदारियां कड़ी कीं, और स्कूली पाठ्यक्रम में डिजिटल सुरक्षा और यौन शिक्षा चाहता है। केंद्र को 10 दिसंबर से पहले प्रगति रिपोर्ट देनी है।

कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

कि ऑनलाइन होना मौलिक अधिकार है, और बच्चों को भी यह अधिकार है।

जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21, जो जीवन और निजी स्वतंत्रता की रक्षा करता है, और अनुच्छेद 19(1)(ए), जो सूचना पाने और साझा करने की आज़ादी देता है, से जोड़ा। पीठ ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना अनुचित होगा। “बहुत से बच्चों के लिए, खासकर दूरदराज़ के इलाकों में, यह अक्सर सीखने और जानकारी का अकेला ज़रिया होता है।”

यह मामला एनजीओ जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस लेकर आया था, जिसका कहना था कि इस विषय पर कोर्ट के पिछले फैसले के दो साल बाद भी प्लेटफॉर्म बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (सीएसईएएम) से नहीं निपट रहे। पीठ ने माना कि “कहने लायक कोई प्रगति नहीं” हुई है।

क्या किसी अदालत ने पहली बार ऐसा कहा है?

नहीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह सबसे साफ बात है।

सितंबर 2019 में केरल हाई कोर्ट ने कोझिकोड के श्री नारायण कॉलेज की छात्रा फहीमा शिरीन के पक्ष में फैसला दिया था, जिन्हें शाम 6 से रात 10 बजे तक मोबाइल फोन पर रोक का नियम तोड़ने के लिए हॉस्टल से निकाल दिया गया था। जस्टिस पी वी आशा ने कहा था कि इंटरनेट तक पहुंच निजता के अधिकार और शिक्षा के अधिकार का हिस्सा है।

जनवरी 2020 में अनुराधा भसीन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आज़ादी और व्यापार की आज़ादी संरक्षित है, और इंटरनेट बंदी अनिश्चितकाल तक नहीं हो सकती। उसने पहुंच को खुद मौलिक अधिकार घोषित नहीं किया था। पिछले हफ्ते का आदेश उससे आगे जाता है, और इस अधिकार को साफ तौर पर बच्चों तक बढ़ाता है।

क्या इसका मतलब है कि बच्चे कुछ भी देख सकते हैं?

नहीं। यह पूरी रोक को खारिज करता है, सुरक्षा उपायों को नहीं।

पीठ ने कहा कि सुरक्षा का निशाना नुकसानदेह सामग्री और उसे फैलाने वाले होने चाहिए। उसने कहा, “ऐसी नाकामियों की वजह से बच्चे को इंटरनेट से दूर रखना पीड़ित को ही समस्या समझ लेना होगा।” उसने माता-पिता की निगरानी, सामग्री पर पाबंदी और सोशल मीडिया खातों के लिए “चाइल्ड मोड” जैसे संतुलित उपायों की गुंजाइश छोड़ी, जिसे उसने उम्र आधारित प्रतिबंध के विकल्प के रूप में सुझाया। यह सुझाव बाध्यकारी निर्देश नहीं है।

आदेश किस पर रोक लगाता है, और किसकी इजाज़त देता है

इजाज़त नहींइजाज़त या आदेश
पहुंच
प्लेटफॉर्म की नाकामी पर बच्चों को ऑफलाइन रखना
संतुलित पाबंदियां, माता-पिता की निगरानी
खाते
सिर्फ ऑनलाइन नुकसान के आधार पर प्रतिबंध
सोशल मीडिया पर सुझाया गया 'चाइल्ड मोड'
शोषण सामग्री
फ्लैग की गई फाइलों की प्लेटफॉर्म द्वारा दोबारा जांच
राष्ट्रीय डेटाबेस से मेल खाने वाली सामग्री तुरंत हटाना
शिकायतें
स्वचालित टूल से अंतिम फैसला
दो कदम में शिकायत, प्रशिक्षित अधिकारी का फैसला

हैश डेटाबेस क्या है?

ज्ञात शोषण सामग्री के डिजिटल फिंगरप्रिंट की एक राष्ट्रीय सूची, ताकि उसे अपने आप पहचान कर हटाया जा सके।

हैश किसी फाइल से निकाला गया एक छोटा कोड होता है; एक ही तस्वीर कहीं भी अपलोड हो, उसका कोड वही रहता है। कोर्ट ने केंद्र से नेशनल हैश एंड यूआरएल लिस्ट डेटाबेस बनाने को कहा, जिसका इस्तेमाल सिर्फ सीएसईएएम पहचानने और हटाने के लिए होगा। किसी हैश या वेब पते को जोड़ने से पहले सामग्री कई स्तर की जांच से गुज़रेगी, जिसके अंत में कम से कम तीन प्रशिक्षित मानव विश्लेषक उसका आकलन करेंगे। इसके बाद प्लेटफॉर्म को अपनी जांच किए बिना मेल खाने वाली सामग्री तुरंत बंद करके हटानी होगी।

प्लेटफॉर्म को और क्या करना होगा?

उन्हें अपने शिकायत अधिकारियों का ब्योरा प्रमुखता से दिखाना होगा, उपयोगकर्ताओं को ज़्यादा से ज़्यादा दो कदम में शोषण की शिकायत करने देनी होगी, और शिकायतों पर अंतिम फैसला स्वचालित सिस्टम के बजाय प्रशिक्षित अधिकारियों पर छोड़ना होगा। केंद्र को सभी बड़े सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए हैश-मिलान और यूआरएल सूची पर दिशानिर्देश बनाने होंगे, और प्लेटफॉर्म अभी जो तकनीक इस्तेमाल करते हैं उस पर हलफनामा देना होगा। कोर्ट ने सरकार से नाकामियों की गंभीरता, उनके दोहराव और कंपनी के आकार से जुड़े कड़े जुर्माने पर विचार करने को भी कहा, और कहा कि पेवॉल के पीछे ऐसी सामग्री से हुई कमाई ज़ब्त की जानी चाहिए।

स्कूलों में क्या बदलेगा?

डिजिटल सुरक्षा और यौन शिक्षा मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनें। कोर्ट चाहता है कि एनसीईआरटी और राज्य परिषदें सहमति, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, और बिना डर के शोषण की शिकायत करने पर उम्र के हिसाब से पाठ पढ़ाएं, साथ में शिक्षकों का प्रशिक्षण, माता-पिता के लिए जागरूकता कार्यक्रम और पीड़ितों के लिए मुफ्त परामर्श हो।

आगे क्या होगा?

केंद्र को 10 दिसंबर को मामले की अगली सुनवाई से पहले प्रगति हलफनामा देना है। पीठ के शब्दों में: “हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी आज़ादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं। हमारे बच्चे दोनों के हकदार हैं।”