नीतिसुप्रीम कोर्ट
बच्चों को भी इंटरनेट का मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने पूरी पाबंदी का विचार खारिज किया
अदालत ने कहा कि प्लेटफॉर्म अगर बाल यौन शोषण सामग्री नहीं हटा पाते, तो इसकी सजा बच्चों को इंटरनेट से दूर रखकर नहीं दी जा सकती। राष्ट्रीय हैश डेटाबेस बनाने का आदेश भी दिया।

मुख्य बातें
- अदालत ने कहा कि इंटरनेट तक पहुंच बच्चों समेत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
- बाल यौन शोषण सामग्री पकड़ने और हटाने के लिए नेशनल हैश ऐंड यूआरएल लिस्ट डेटाबेस बनाने का आदेश दिया गया।
- केंद्र को अगली सुनवाई 10 दिसंबर से पहले प्रगति हलफनामा दाखिल करना है।
सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने कहा है कि इंटरनेट तक पहुंचने और उसका इस्तेमाल करने का अधिकार बच्चों समेत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। अदालत के मुताबिक टेक प्लेटफॉर्म अगर बाल यौन शोषण सामग्री नहीं हटा पाते, तो इसे बच्चों को इंटरनेट से दूर रखने का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, “हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।” पीठ ने जोड़ा, “हमारे बच्चे दोनों के हकदार हैं।”
15 अक्टूबर के आदेश में यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) से जोड़ा गया है, जिसमें जानकारी पाने और साझा करने की आजादी शामिल है। पीठ ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह वंचित करना अनुचित होगा। “कई बच्चों के लिए, खासकर दूरदराज के इलाकों में, यह अक्सर सीखने और जानकारी का अकेला जरिया होता है।”
निशाने पर नुकसान हो, बच्चा नहीं
मामला गैर-सरकारी संगठन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की याचिका से आया। संगठन ने अदालत को बताया कि इस विषय पर सितंबर 2024 के फैसले के दो साल बाद भी इंटरमीडियरी बाल यौन शोषण सामग्री (सीसैम) से निपटने में नाकाम हैं। पीठ ने माना कि “कहने लायक कोई प्रगति नहीं” हुई है, और रीडायरेक्ट लिंक और वेबसाइटों के जरिए पैसे लेकर ऐसी सामग्री के प्रचार की खबरों का भी जिक्र किया।
अदालत ने कहा कि सुरक्षा के उपाय सामग्री और उसके पीछे के लोगों पर होने चाहिए। “ऐसी नाकामियों की वजह से बच्चे को इंटरनेट से दूर रखना पीड़ित को ही समस्या समझ लेना होगा।”
अदालत ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं कि माता-पिता की निगरानी, सामग्री पर पाबंदी या सोशल मीडिया खातों के लिए “चाइल्ड मोड” जैसे संतुलित उपाय नहीं हो सकते। उम्र के आधार पर रोक के बजाय उसने चाइल्ड मोड का सुझाव दिया।
केंद्र और प्लेटफॉर्म को क्या करना होगा
पीठ ने केंद्र सरकार से नेशनल हैश ऐंड यूआरएल लिस्ट डेटाबेस बनाने को कहा, जिसका इस्तेमाल सिर्फ सीसैम पकड़ने और हटाने में होगा। किसी सामग्री का हैश या वेब पता दर्ज होने से पहले उसकी कई स्तर पर जांच होगी, और आखिरी आकलन कम से कम तीन प्रशिक्षित विश्लेषक करेंगे। इसके बाद प्लेटफॉर्म को मेल खाने वाली सामग्री अपनी ओर से दोबारा जांचे बिना तुरंत हटानी होगी।
केंद्र को सभी बड़े सोशल मीडिया इंटरमीडियरी के लिए हैश-मैचिंग और यूआरएल सूची पर दिशानिर्देश बनाने हैं, और एक हलफनामे में बताना है कि प्लेटफॉर्म अभी ऐसी सामग्री पकड़ने के लिए कौन-सी तकनीक इस्तेमाल करते हैं। कंपनियों को शिकायत अधिकारियों का ब्योरा साफ-साफ दिखाना होगा, दो कदम में शिकायत की सुविधा देनी होगी, और अंतिम फैसला स्वचालित टूल की जगह प्रशिक्षित अधिकारी करेंगे।
अदालत ने सरकार से कहा कि वह गलती की गंभीरता, उसके दोहराव और कंपनी के आकार व टर्नओवर के हिसाब से भारी जुर्माने पर विचार करे। पेवॉल के पीछे ऐसी सामग्री से हुई कमाई जब्त की जानी चाहिए।
अदालत चाहती है कि एनसीईआरटी और राज्य परिषदें डिजिटल सुरक्षा और उम्र के मुताबिक यौन शिक्षा को मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाएं, जिसमें सहमति, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श और बिना डर शिकायत करने के तरीके शामिल हों। शिक्षकों के प्रशिक्षण, अभिभावकों के जागरूकता कार्यक्रम और पीड़ितों को मुफ्त काउंसलिंग के निर्देश भी दिए गए हैं।
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। मामला 10 दिसंबर को फिर सुना जाएगा, और सरकार को उससे पहले प्रगति हलफनामा दाखिल करना है।