समझिएकानून
संजय राउत और निखिल वागले के खिलाफ अवमानना के लिए सुप्रीम कोर्ट बार को अटॉर्नी जनरल की मंज़ूरी क्यों चाहिए थी
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश पर टिप्पणियों को लेकर शिवसेना (यूबीटी) सांसद और पत्रकार को कारण बताओ नोटिस जारी किए। मामला अदालत तक तभी पहुंच सका जब अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने अपनी सहमति दी। अदालत की अवमानना क्या है, यह सहमति क्यों ज़रूरी है, और आगे क्या हो सकता है।
संक्षेप में
आपराधिक अवमानना में ऐसे शब्द या काम आते हैं जो किसी अदालत को बदनाम करें या उसका अधिकार घटाएं, या न्याय में दखल दें। अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 के तहत सुप्रीम कोर्ट खुद कार्रवाई कर सकता है, या अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की अर्ज़ी पर; बाकी किसी को, जैसे सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन को, पहले अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित सहमति लेनी होती है। यह नियम बेबुनियाद मामलों को छांटने का ज़रिया है। अधिकतम सज़ा छह महीने की जेल, ₹2,000 जुर्माना या दोनों है, और अदालत माफी स्वीकार कर ले तो मामला खत्म हो सकता है।
अदालत की अवमानना क्या है?
यह अदालत की वह शक्ति है जिससे वह अपने आदेशों की अवहेलना या अपने अधिकार को कमज़ोर करने वाले आचरण को सज़ा दे सकती है।
अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 अवमानना को दो तरह में बांटता है। सिविल अवमानना किसी अदालत के फैसले, आदेश या निर्देश की जानबूझकर अवहेलना, या अदालत को दिए गए वचन को तोड़ना है। आपराधिक अवमानना ऐसी कोई भी चीज़ प्रकाशित करना या ऐसा कोई काम करना है जो अदालत को बदनाम करे या उसका अधिकार घटाए, किसी मामले में दखल दे, या किसी और तरीके से न्याय के काम में बाधा डाले। शब्द बोले गए या लिखे हुए हो सकते हैं, और इनमें संकेत और तस्वीरें भी शामिल हैं।
यह शक्ति सीधे संविधान से मिलती है। अनुच्छेद 129 सुप्रीम कोर्ट को कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड बनाता है और उसे अपनी अवमानना की सज़ा देने का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 215 हाईकोर्ट (उच्च न्यायालयों) के लिए यही करता है।
सिविल और आपराधिक अवमानना
सुप्रीम कोर्ट बार को अटॉर्नी जनरल की ज़रूरत क्यों पड़ी?
क्योंकि अधिनियम की धारा 15 किसी निजी पक्ष को सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही तभी शुरू करने देती है जब अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल लिखित सहमति दें।
धारा तीन रास्ते बताती है। अदालत अपनी ओर से, यानी स्वतः संज्ञान लेकर, कार्रवाई कर सकती है। अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल सीधे अदालत जा सकते हैं। बाकी किसी को पहले इनमें से किसी एक की लिखित सहमति लेनी होगी। हाईकोर्ट के लिए यही काम राज्य के महाधिवक्ता करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने गुरुवार 15 अक्टूबर को अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी को पत्र लिखा, और उन्होंने उसी दिन सहमति दे दी। अपने पत्र में उन्होंने संजय राउत और निखिल वागले की पोस्ट को “प्रथम दृष्टया अपमानजनक” बताया।
सहमति के नियम का मकसद क्या है?
बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित शिकायतों को अदालत का समय लेने से पहले ही छांट देना।
जजों की हर दिन आलोचना होती है। कोई छलनी न हो, तो कोई भी वादी या राजनीतिक विरोधी अदालतों के आलोचकों के खिलाफ अवमानना याचिकाएं दायर कर सकता है। सरकार के वरिष्ठ विधि अधिकारी की सहमति यह सुनिश्चित करने के लिए है कि केवल गंभीर मामले आगे आएं।
अटॉर्नी जनरल इस शक्ति का इस्तेमाल दोनों तरफ करते हैं। 2020 में के के वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट के बारे में पोस्ट को लेकर कॉमेडियन कुणाल कामरा और कार्टूनिस्ट रचिता तनेजा के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की सहमति दी, और अभिनेत्री स्वरा भास्कर और आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के खिलाफ मामलों में सहमति देने से इनकार किया।
अटॉर्नी जनरल मना कर दें तो क्या अदालत कार्रवाई कर सकती है?
हां। अदालत हमेशा अपनी ओर से मामला उठा सकती है।
इनकार से निजी पक्ष की याचिका आम तौर पर खत्म हो जाती है, लेकिन व्यक्ति टिप्पणियों को अदालत के ध्यान में लाकर उससे स्वतः संज्ञान लेने को कह सकता है, जिसके लिए किसी सहमति की ज़रूरत नहीं होती। हाल का सबसे चर्चित उदाहरण 2020 में वकील प्रशांत भूषण के दो ट्वीट पर चला मामला है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खुद शुरू किया और जिसमें उन पर एक रुपये का जुर्माना लगाया। अधिनियम समय सीमा भी तय करता है: कथित अवमानना के एक साल के भीतर कार्यवाही शुरू होनी चाहिए।
क्या किसी जज की आलोचना अवमानना है?
अपने आप में नहीं। अधिनियम और अदालतें निष्पक्ष आलोचना की रक्षा करते हैं।
अदालती कार्यवाही की निष्पक्ष और सटीक रिपोर्टिंग अवमानना नहीं है, और न ही किसी मामले के फैसले के बाद उस पर निष्पक्ष टिप्पणी। 1988 के एक मामले में, जो तत्कालीन कानून मंत्री पी शिव शंकर की टिप्पणियों से जुड़ा था, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल अदालत की आलोचना अवमानना नहीं है। 2006 के संशोधन के बाद से सच एक बचाव है, अगर वह जनहित में हो और दावा नेकनीयती से किया गया हो। अदालतों ने यह भी कहा है कि अवमानना का इस्तेमाल कम से कम हो, और केवल वहीं जहां न्याय पर जनता का भरोसा सचमुच खतरे में हो।
एससीबीए की याचिका यह फर्क मानती है। उसका कहना है कि राउत और वागले की टिप्पणियां “निष्पक्ष आलोचना से आगे जाती हैं”।
अब आगे क्या होगा?
राउत और वागले को कारण बताओ नोटिस का जवाब देना होगा, और फिर अदालत तय करेगी कि आगे बढ़ना है या नहीं।
शुक्रवार 16 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने नोटिस जारी किए और दोनों को फिलहाल व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दी। अवमानना के मामले में नोटिस सीधे व्यक्ति को तामील करना होता है, और मामले की सुनवाई कम से कम दो जजों की पीठ करती है।
अगर अदालत आगे बढ़ती है और उन्हें दोषी पाती है, तो अधिकतम सज़ा छह महीने की साधारण कैद, ₹2,000 तक का जुर्माना, या दोनों है। अदालत माफी को सच्चा मानकर व्यक्ति को बरी भी कर सकती है या सज़ा माफ कर सकती है। वागले बिना शर्त माफी मांग चुके हैं और अपनी पोस्ट हटा चुके हैं। शुक्रवार शाम तक राउत ने सार्वजनिक रूप से कोई जवाब नहीं दिया था। अगली सुनवाई की तारीख अभी पता नहीं है।