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हिरासत, गिरफ्तारी नहीं: प्रदर्शन शुरू होने से पहले पुलिस को बीएनएसएस क्या-क्या करने देता है

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान इस महीने दिल्ली में मुख्यमंत्रियों से लेकर छात्रों तक हज़ारों लोगों को हिरासत में लिया गया है। पुलिस ने नई आपराधिक प्रक्रिया संहिता की कुछ धाराओं का सहारा लिया है। ये धाराएं क्या इजाज़त देती हैं, किसी को कितनी देर रोका जा सकता है, और सीमा कहां है।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 170 के तहत पुलिस किसी संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है, और धारा 172 के तहत पुलिस के वैध निर्देश का विरोध या अनदेखी करने वाले को हिरासत में ले सकती है या हटा सकती है। दोनों ही स्थितियों में आम तौर पर व्यक्ति को 24 घंटे से ज़्यादा नहीं रोका जा सकता। इसके बाद कार्यकारी मजिस्ट्रेट धारा 126 के तहत व्यक्ति से एक साल तक शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरवा सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) जैसे निवारक नज़रबंदी कानूनों के तहत हिरासत एक अलग और कहीं ज़्यादा सख्त शक्ति है।

क्या हिरासत में लिया जाना गिरफ्तारी के बराबर है?

पूरी तरह नहीं, हालांकि कानून में दोनों के बीच की रेखा शब्दों से कहीं ज़्यादा पतली है।

गिरफ्तारी किसी कानूनी शक्ति के तहत व्यक्ति को औपचारिक रूप से हिरासत में लेने की कार्रवाई है, आम तौर पर इसलिए कि पुलिस को शक है कि उसने अपराध किया है। प्रदर्शनों में “हिरासत” का मतलब अक्सर कुछ छोटा होता है: पुलिस लोगों को रोकती है, बसों में बिठाती है और कुछ घंटे किसी स्टेडियम या थाने में रखकर छोड़ देती है।

दोनों में से कोई भी कदम वैध है या नहीं, यह इस्तेमाल की गई शक्ति और उसकी वजह पर निर्भर करता है, नाम पर नहीं। अक्टूबर में दिल्ली पुलिस ने दोनों शब्दों का इस्तेमाल किया है। 10 अक्टूबर को दिल्ली हवाई अड्डे पर रोके गए सीजेपी नेताओं अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास के बारे में पुलिस ने कहा कि यह “बीएनएसएस की धारा 126/170 के तहत निवारक गिरफ्तारी” थी।

धारा 170 क्या इजाज़त देती है?

इसके तहत पुलिस किसी ऐसे संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है, जिसकी योजना बनाए जाने का उसे विश्वास हो।

धारा कहती है कि जिस पुलिस अधिकारी को किसी संज्ञेय अपराध की योजना की जानकारी हो, वह मजिस्ट्रेट के आदेश और वारंट के बिना योजना बनाने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। शर्त यह है कि अधिकारी को लगना चाहिए कि अपराध को “किसी और तरीके से रोका नहीं जा सकता”।

गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के समय से 24 घंटे से ज़्यादा नहीं रखा जा सकता, जब तक कि बीएनएसएस का कोई और प्रावधान या कोई दूसरा कानून इससे लंबी हिरासत की अनुमति न दे। 1 जुलाई 2024 को बीएनएसएस लागू होने पर धारा 170 ने पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 151 की जगह ली।

और धारा 172?

यह एक नई शक्ति है, जो हर व्यक्ति को अपराध रोकने के लिए दिए गए पुलिस के वैध निर्देश मानने के लिए बाध्य करती है, और न मानने वालों को हिरासत में लेने या हटाने देती है।

धारा 172 के तहत “सभी व्यक्ति” बीएनएसएस के निवारक कार्रवाई वाले अध्याय के तहत दिए गए पुलिस अधिकारी के वैध निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। ऐसे निर्देश का विरोध या अनदेखी करने वाले व्यक्ति को हिरासत में लिया या हटाया जा सकता है। इसके बाद पुलिस को या तो उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा, या छोटे मामलों में “24 घंटे के भीतर जितनी जल्दी हो सके” छोड़ना होगा।

सीआरपीसी में ऐसी कोई धारा नहीं थी। आलोचकों का कहना है कि इसके शब्द पुलिस को बहुत ज़्यादा विवेकाधिकार देते हैं, क्योंकि प्रदर्शन में लगभग कोई भी निर्देश, जैसे हट जाने का आदेश, अपराध रोकने के निर्देश के रूप में पेश किया जा सकता है।

प्रदर्शनकारियों पर इस्तेमाल होने वाली चार शक्तियां, और उनमें फर्क

कौन इस्तेमाल करता हैकब लागू होती हैकितनी देर
बीएनएसएस धारा 170
पुलिस अधिकारी
यह विश्वास कि संज्ञेय अपराध की योजना है और उसे और किसी तरह नहीं रोका जा सकता
24 घंटे, जब तक कोई और कानून ज़्यादा की अनुमति न दे
बीएनएसएस धारा 172
पुलिस अधिकारी
पुलिस के वैध निर्देश का विरोध या अनदेखी
24 घंटे के भीतर रिहाई या मजिस्ट्रेट के सामने पेशी
बीएनएसएस धारा 126
कार्यकारी मजिस्ट्रेट
शांति भंग की आशंका
एक साल तक शांति बनाए रखने का बॉन्ड
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून
ज़िला मजिस्ट्रेट या राज्य
सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा
12 महीने तक, सलाहकार बोर्ड की समीक्षा के साथ

24 घंटे के बाद क्या होता है?

ज़्यादातर प्रदर्शनकारियों को बस छोड़ दिया जाता है, लेकिन कुछ को धारा 126 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने ले जाया जाता है।

सीआरपीसी की धारा 107 की जगह आई धारा 126 के तहत, अगर कार्यकारी मजिस्ट्रेट को जानकारी हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, तो वह उससे यह बताने को कह सकता है कि उसे एक साल तक की अवधि के लिए शांति बनाए रखने का बॉन्ड क्यों न भरना पड़े।

सीजेपी के तीनों नेताओं के साथ यही हुआ। 11 अक्टूबर को दिल्ली कैंटोनमेंट थाने में एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने उन्हें ₹50,000 के ज़मानती बॉन्ड पर रिहा किया, इस शर्त के साथ कि वे एक साल तक शांति भंग नहीं करेंगे। ऐसा बॉन्ड तोड़ने पर ज़मानत की रकम ज़ब्त हो सकती है और व्यक्ति को बाकी अवधि के लिए जेल भेजा जा सकता है।

हिरासत में लिए गए व्यक्ति के क्या अधिकार हैं?

गिरफ्तारी वाली बुनियादी सुरक्षाएं लागू होती हैं: वजह बताना, वकील, और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट।

संविधान का अनुच्छेद 22 कहता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी की वजह बताई जानी चाहिए, वह अपनी पसंद के वकील से सलाह ले सकता है, और उसे यात्रा का समय छोड़कर 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट के 1997 के डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल फैसले ने इसमें और बातें जोड़ीं: अधिकारी साफ पहचान पहनें, गिरफ्तारी मेमो बनाएं और किसी रिश्तेदार या दोस्त को सूचना दें। बीएनएसएस असाधारण मामलों को छोड़कर, और वह भी मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति से, महिलाओं को सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच गिरफ्तार करने पर रोक लगाता है।

सुप्रीम कोर्ट में अभी लंबित कई याचिकाएं, जो बार एसोसिएशनों, पत्रकार संगठनों और डीवाईएफआई ने दायर की हैं, कहती हैं कि 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में इन सुरक्षाओं की अनदेखी हुई और लोगों को बिना वजह बताए या कोई मेमो दिए घंटों बसों में रखा गया।

क्या यह एनएसए के तहत निवारक नज़रबंदी जैसा ही है?

नहीं। वह एक अलग और कहीं ज़्यादा सख्त व्यवस्था है।

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 जैसे कानून राज्य को किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के एक साल तक इस आधार पर हिरासत में रखने देते हैं कि वह सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ काम कर सकता है। अनुच्छेद 22 खुद ऐसे कानूनों को 24 घंटे वाले सामान्य नियम से बाहर रखता है और उसकी जगह सलाहकार बोर्ड की समीक्षा का प्रावधान करता है। दिल्ली के प्रदर्शनों में हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत रखे जाने की जानकारी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?

यह कि शांतिपूर्ण लोगों को कानून से बाहर जाकर हिरासत में नहीं लिया जा सकता।

रविवार 11 अक्टूबर को विशेष बैठक में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने कहा कि किसी को भी “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के सिवा हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए, खासकर निषेधाज्ञा वाले इलाके से बाहर शांतिपूर्ण, निहत्थे समूहों में शामिल लोगों को। अदालत अब हिरासतों पर दायर याचिकाओं की सुनवाई कर रही है। वह धारा 172 को कैसे पढ़ती है, जिसकी उसने अभी विस्तार से जांच नहीं की है, यह आने वाले कई सालों तक तय कर सकता है कि प्रदर्शनों में पुलिस के पास कितनी गुंजाइश है।

मूल दस्तावेज़