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संघ के शताब्दी वर्ष के समापन पर भागवत बोले, विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में हों
नागपुर में विजयादशमी उत्सव में, जहां जगदीप धनखड़ भी मेहमानों में थे, आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सत्ता परिवर्तन "न हुआ है, न होगा"।

मुख्य बातें
- मोहन भागवत ने रेशिमबाग की सभा में कहा कि सत्ता परिवर्तन "न हुआ है, न होगा"।
- पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ आमंत्रित अतिथि के रूप में पहुंचे; दैनिक जागरण के संपादक संजय गुप्त मुख्य अतिथि थे।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे "बहुत प्रेरक संबोधन" बताया।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को नागपुर में संघ के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी संबोधन में प्रदर्शनकारियों, सरकारों और नेताओं, सभी से संविधान के दायरे में रहने को कहा। विदेशों में हाल की उथल-पुथल को लेकर चल रही सत्ता परिवर्तन की चर्चा पर उन्होंने कहा कि यह “न हुआ है, न होगा”।
रेशिमबाग मैदान की इस वार्षिक सभा के साथ आरएसएस का सौवां वर्ष पूरा हुआ। संघ की स्थापना केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में की थी। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ आमंत्रित अतिथियों में बैठे थे, जिनके न्योते पर पिछले हफ्ते कांग्रेस ने तंज कसा था। दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त मुख्य अतिथि थे। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले भी मौजूद थे। मुंबई में इस्राइल के महावाणिज्य दूत भी अतिथियों में थे।
विरोध और उसकी सीमाएं
भागवत ऐसे समय बोल रहे थे जब देश में “सत्ता परिवर्तन” को लेकर तीखी बहस छिड़ी है। यह बहस मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के सड़क अभियान से शुरू हुई है। उन्होंने फ्रांस के प्रदर्शनों और अल्बानिया, नेपाल व बांग्लादेश की घटनाओं का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि सामाजिक समस्याओं और व्यवस्था की कमियों के खिलाफ विरोध स्वाभाविक है। लेकिन प्रदर्शनकारियों, प्रशासकों और राजनीतिक नेताओं, सभी को संविधान, कानून और सभ्य सार्वजनिक संवाद का सम्मान करना होगा। उनके मुताबिक, सिर्फ आंदोलनों से समस्याएं हल नहीं होतीं, और जिस आंदोलन के पीछे कोई और मकसद हो, वह राजनीतिक हो जाता है और देश-विरोधी ताकतें उसका फायदा उठा सकती हैं।
उन्होंने कहा, “सामाजिक भागीदारी और आपसी संवाद बढ़ना चाहिए। समाज और देश चलाने की जिम्मेदारी हमारी भी है।”
स्वबोध और प्रस्तावना
संबोधन का बड़ा हिस्सा “स्वबोध” यानी आत्म-जागरूकता पर था, जिसे भागवत ने संविधान की प्रस्तावना के शुरुआती शब्दों “हम, भारत के लोग” से जोड़ा। उन्होंने कहा कि संघ सौ साल से जो काम कर रहा है, उसका मकसद ठीक यही आत्म-जागरूकता जगाना है, और इसी आधार पर वह “भारत को एकजुट और मजबूत बनाने का प्रयास करता है”। उन्होंने स्वबोध और स्वदेशी को संघ के “पंच परिवर्तन” कार्यक्रम का हिस्सा बताया।
उन्होंने कहा, “भारत विविधताओं की भूमि है; इस विविधता को स्वीकार करना और उसकी रक्षा करना हमारा पारंपरिक स्वभाव रहा है।”
उन्होंने संत रविदास की 650वीं जयंती का उल्लेख किया और आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद, जिनके निधन को सौ साल हो गए, और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को श्रद्धांजलि दी, जिनके बारे में उन्होंने कहा कि उन्होंने “ओडिशा में हमारे जनजातीय भाइयों की सेवा में जीवन समर्पित कर दिया”।
दुनिया की ओर देखते हुए भागवत ने कहा कि भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और पर्यावरण संकट बढ़ने के साथ दुनिया भारत पर ज्यादा ध्यान दे रही है। उन्होंने कहा, “दुनिया जानती है कि इनके जवाब भारत के पास हैं।”
प्रतिक्रियाएं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, जिन्होंने सुबह आरएसएस स्थापना दिवस पर स्वयंसेवकों को बधाई दी थी, इसे “बहुत प्रेरक संबोधन” बताया और खास तौर पर “सेवा और राष्ट्र निर्माण की प्रतिबद्धता” पर जोर का जिक्र किया।
केरलम भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि भागवत की “दृष्टि और अनुभव सभी भारतीयों के लिए मार्गदर्शक होना चाहिए”। उन्होंने कहा कि शत्रु ताकतें भारत की रफ्तार धीमी करने के लिए देश के भीतर अपने दोस्तों का इस्तेमाल करेंगी। उन्होंने शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत को, जिन्होंने कहा था कि भारत को अल्बानिया से सबक लेना चाहिए, “उकसाने वाला” कहा।
जुलाई 2025 में उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने वाले धनखड़ ने कार्यक्रम में कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की।