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पूर्व जज एस के कौल का दावा, चंद्रचूड़ जजों के नामों पर सरकार की 'पूर्व-मंज़ूरी' लेते थे

आने वाले संस्मरण और एक टीवी इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज ने बताया है कि कॉलेजियम की बैठक में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने सरकार को फ़ोन करने की बात सोची थी। चंद्रचूड़ का कहना है कि उन्होंने किताब नहीं पढ़ी।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ (फ़ाइल फ़ोटो)
पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Press Information Department / Wikimedia Commons, Public domain

मुख्य बातें

  1. जस्टिस संजय किशन कौल के संस्मरण का नाम 'विदाउट फ़ियर ऑर फ़ेवर' है।
  2. उनका कहना है कि मुख्य न्यायाधीश रहते डी वाई चंद्रचूड़ नियुक्तियों पर सरकार के प्रति 'ज़रूरत से ज़्यादा झुके' रहते थे।
  3. कांग्रेस ने कहा कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल उठते हैं।

दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) से सेवानिवृत्त हुए जस्टिस संजय किशन कौल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ पर आरोप लगाया है कि वे कॉलेजियम का फ़ैसला पूरा होने से पहले ही जजों के नामों पर सरकार की मंज़ूरी लेते थे।

कौल ने यह आरोप अपने आने वाले संस्मरण ‘विदाउट फ़ियर ऑर फ़ेवर’ में लगाया है और पत्रकार करण थापर को द वायर के लिए दिए एक टीवी इंटरव्यू में इसे दोहराया, जिसके अंश रविवार को सामने आए। शाम तक यह राजनीतिक मुद्दा बन चुका था और कांग्रेस ने कहा कि इससे अदालतों की स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं।

छठा नाम

कौल जिस घटना का ज़िक्र करते हैं, वह सुप्रीम कोर्ट में खाली पदों पर कॉलेजियम की एक बैठक की है। पांच नामों पर पहले से सहमति थी। वे लिखते हैं कि आखिरी समय में चंद्रचूड़ ने छठा नाम रख दिया।

कौल लिखते हैं कि फिर चंद्रचूड़ उन्हें एक तरफ़ ले गए और “ज़ोर से सोचने लगे कि क्या उन्हें सरकार की राय जानने के लिए फ़ोन करना चाहिए”। कौल के मुताबिक उन्होंने सलाह दी कि कॉलेजियम के विचार-विमर्श के दौरान ऐसा न किया जाए, और उन्होंने तथा दूसरे सदस्यों ने छठे उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया। इंटरव्यू में कौल ने कहा कि उन्हें शक था कि सरकार बाकी नामों को शायद पहले ही हरी झंडी दे चुकी थी।

वे लिखते हैं, “परामर्श और उस चीज़ में फ़र्क है जिसे मैं पूर्व-मंज़ूरी मानने लगा था। इससे गलत संदेश जाता है।”

कौल ने कहा कि वे सरकार से परामर्श के खिलाफ़ नहीं हैं। उनकी चिंता समय को लेकर थी। उन्होंने थापर से कहा, “अगर आप पूरी सूची पर पहले ही चर्चा कर लेते हैं, तो इससे अपनी तरह की समस्याएं पैदा होती हैं।” उनका तर्क था कि यह आगे के मुख्य न्यायाधीशों, खासकर छोटे कार्यकाल वालों, से अपेक्षा बन सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि यह नया नहीं है: “ऐसा होता था। मुझे लगता है, यह पहले भी होता रहा है और बाद में भी।”

उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ की न्यायिक क्षमता या मेहनत को लेकर उन्हें कोई शिकायत नहीं है, लेकिन नियुक्तियों से जुड़े प्रशासनिक सवालों पर वे उन्हें सरकार के प्रति “ज़रूरत से ज़्यादा झुका हुआ” पाते थे।

दूसरी असहमतियां

कौल धन शोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर पुनर्विचार वाले मामले के बारे में भी लिखते हैं। उनके मुताबिक चंद्रचूड़ के साथ एक “बीच के रास्ते” की बात हुई थी, और उन्होंने जस्टिस संजीव खन्ना के साथ सुनवाई आगे बढ़ाई। उनका कहना है कि जजों की नियुक्ति में देरी वाला मामला चंद्रचूड़ ने उनकी पीठ से ले लिया था, जबकि कौल ने सरकार पर नाम मंज़ूर करने का दबाव बनाने के लिए उसमें नोटिस जारी किया था।

अदालत के कामकाज पर वे लिखते हैं कि प्रशासन ज़्यादातर रजिस्ट्री और मुख्य न्यायाधीश के बीच का मामला होता है और दूसरे जजों से बहुत कम सलाह ली जाती है।

चंद्रचूड़ और कांग्रेस

चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्होंने किताब नहीं पढ़ी है और संदर्भ जाने बिना विस्तार से जवाब नहीं दे सकते। उन्होंने अपनी कॉलेजियम बैठकों को सम्मानजनक और तर्कपूर्ण चर्चा वाली बताया और कहा कि उन्हें याद नहीं कि कौल कभी बैठक छोड़कर गए हों या कॉलेजियम के प्रस्तावों में कोई असहमति दर्ज हुई हो।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा कि यह संस्मरण “मोदी सरकार के दौर में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल” खड़े करता है, और उन्होंने नियुक्तियों में सरकार के कथित दखल का ज़िक्र किया। सरकार ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है।