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राज्यकेरलम

केरल अब आधिकारिक तौर पर केरलम: नाम कैसे बदला और इससे क्या बदलता है

गृह मंत्रालय की अधिसूचना के बाद केरल (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 2026 25 अगस्त से लागू हो गया। इससे संविधान की पहली अनुसूची में राज्य का नाम बदल गया है।

संपादकीय डेस्क से · तिरुवनंतपुरमप्रकाशित
तिरुवनंतपुरम में केरल विधानसभा भवन
तिरुवनंतपुरम में केरल विधानसभा भवनVinayaraj / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 25 अगस्त 2026 को वह तारीख अधिसूचित की जिस दिन से केरल (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 2026 लागू हुआ।
  2. यह अधिनियम संविधान की पहली अनुसूची में 'केरल' की जगह राज्य का मलयालम नाम 'केरलम' दर्ज करता है।
  3. यह बदलाव अनुच्छेद 3 के रास्ते से हुआ: राज्य का अनुरोध, राष्ट्रपति की ओर से विधानसभा को संदर्भ, दोनों सदनों से पारित होना और राष्ट्रपति की मंजूरी।
  4. लोकसभा ने 11 अगस्त को बिना बहस के ध्वनिमत से विधेयक पारित किया; राज्यसभा ने अगले दिन इस पर बहस की।

केरल का आधिकारिक नाम अब केरलम है। द न्यूज़ मिनट और ऑनमनोरमा के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 25 अगस्त 2026 को राजपत्र अधिसूचना जारी कर उसी दिन को केरल (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 2026 के लागू होने की तारीख तय किया। यह अधिसूचना ओणम से ठीक पहले आई।

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक, यह अधिनियम संविधान की पहली अनुसूची में राज्य का नाम बदलता है। केरलम राज्य का मलयालम नाम है।

नाम कैसे बदला गया

संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को कानून बनाकर किसी राज्य का नाम बदलने का अधिकार देता है। ऑनमनोरमा ने 26 अगस्त को समझाया कि ऐसे विधेयक के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश ज़रूरी होती है, और राष्ट्रपति को पहले उसे राज्य विधानमंडल के पास उसकी राय के लिए भेजना होता है।

केरल से केरलम तक

  1. 24 जून 2024केरल विधानसभा ने केरलम नाम की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया; राज्य ने इसे केंद्र को भेजा
  2. 2026राष्ट्रपति ने विधेयक केरल विधानसभा को भेजा, जिसने सर्वसम्मति से इसका समर्थन किया (तारीख की पुष्टि नहीं)
  3. 10 अगस्त 2026गृह मंत्रालय ने लोकसभा में विधेयक पेश किया
  4. 11 अगस्त 2026लोकसभा ने ध्वनिमत से विधेयक पारित किया
  5. 12 अगस्त 2026राज्यसभा ने ध्वनिमत से विधेयक पारित किया
  6. 18 अगस्त 2026 तकराष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दी
  7. 25 अगस्त 2026गृह मंत्रालय की अधिसूचना से अधिनियम लागू हुआ

ऑनमनोरमा के मुताबिक, विधानसभा के 2024 के प्रस्ताव में इस मांग को 1956 में भाषाई आधार पर हुए राज्यों के पुनर्गठन से जोड़ा गया था और यह भी कहा गया था कि राज्य का स्थापना दिवस, केरल पिरवी, 1 नवंबर को पड़ता है।

क्या बदलता है

25 अगस्त से संविधान में राज्य के नाम के तौर पर “केरल” की जगह “केरलम” दर्ज है। द न्यूज़ मिनट के मुताबिक, गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में कहा, “विधेयक में प्रावधान है कि केरल राज्य को केरलम राज्य के नाम से जाना जाएगा।”

ऑनमनोरमा और द न्यूज़ मिनट के मुताबिक, अधिनियम इस बदलाव के लिए ज़रूरी परिणामी संशोधन भी करता है। लोकवॉक्स ने जिन रिपोर्टों को देखा, उनमें इन संशोधनों की सूची नहीं है, और न ही यह बताया गया है कि हाईकोर्ट, राज्य के विश्वविद्यालयों या सार्वजनिक निगमों जैसी संस्थाओं के नाम बदलेंगे या नहीं। यह अधिनियम के पाठ से तय होगा।

संसद में क्या हुआ

केरल कौमुदी के मुताबिक, लोकसभा ने 11 अगस्त को बिना चर्चा के ध्वनिमत से विधेयक पारित किया। उस समय विपक्ष एक अलग मुद्दे पर विरोध कर रहा था। कांग्रेस सांसदों ने मांग की थी कि इसे उस दिन न लिया जाए, क्योंकि केरल के सदस्यों को बोलने का मौका नहीं मिलेगा। राय ने कहा कि यह बदलाव केरल के सांसदों की मांग पर किया जा रहा है और विपक्ष का रुख गलत है।

ऑनमनोरमा के मुताबिक, राज्यसभा ने 12 अगस्त को विधेयक पर बहस की और उसे ध्वनिमत से पारित किया। ऑल इंडिया रेडियो के मुताबिक, राय ने कहा कि विधेयक “राज्य के अनुरोध का सम्मान करने के लिए” लाया गया।

कई दलों के सदस्यों ने इस बदलाव का समर्थन किया। केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने इसे “दुनिया भर के चार करोड़ से ज़्यादा मलयालियों के लिए जश्न का पल” बताया और आरोप लगाया कि कांग्रेस और सीपीआई(एम) के सदस्यों ने लोकसभा में चर्चा नहीं होने दी। ऑल इंडिया रेडियो के मुताबिक, तिरुचि शिवा (डीएमके), डेरेक ओ’ब्रायन (तृणमूल) और संजय सिंह (आप) ने समर्थन में अपनी बात रखी। ऑनमनोरमा के मुताबिक, कांग्रेस सांसद जेबी मेथर हिशाम ने बदलाव का स्वागत किया, लेकिन दूसरे राजनीतिक मुद्दे भी उठाए, जिन्हें पीठासीन अधिकारी ने रिकॉर्ड से बाहर रखा।

बहस में नाम बदलने की दूसरी मांगें भी उठीं। भाजपा सांसद समिक भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर पश्चिम बंग करने की मांग की और मौजूदा नाम को “औपनिवेशिक विरासत” बताया। ऑनमनोरमा के मुताबिक, राय ने जवाब दिया कि अगर ऐसा प्रस्ताव राज्य की विरासत और उसके लोगों की इच्छा को दर्शाता हो, तो केंद्र उस पर विचार कर सकता है।

मूल दस्तावेज़