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अक्टूबर में विदेशी निवेशकों ने शेयरों से ₹52,100 करोड़ निकाले, पर बिकवाली धीमी पड़ी

विदेशी फंड इस साल अब तक भारतीय शेयरों से ₹3.12 लाख करोड़ निकाल चुके हैं। शुक्रवार को अमेरिकी यील्ड में नरमी और रुपये की मज़बूती के बीच हल्की खरीदारी हुई, जिससे सवाल उठ रहा है कि क्या सबसे बुरा दौर बीत गया।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
मुंबई के कारोबारी इलाके नरीमन पॉइंट की इमारतें (फ़ाइल फ़ोटो)
मुंबई के कारोबारी इलाके नरीमन पॉइंट की इमारतें (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Ashesh Shah / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने अक्टूबर में अब तक ₹52,100 करोड़ के भारतीय शेयर शुद्ध रूप से बेचे हैं।
  2. 2026 में कुल निकासी ₹3.12 लाख करोड़ हो गई है, जो पूरे 2025 के ₹1.66 लाख करोड़ का लगभग दोगुना है।
  3. अमेरिकी 10-वर्षीय यील्ड 5.08% पर आने के बीच विदेशी निवेशक 16 अक्टूबर को मामूली खरीदार बने।

डिपॉज़िटरी के आंकड़ों के मुताबिक विदेशी निवेशकों ने अक्टूबर में अब तक ₹52,100 करोड़ के भारतीय शेयर शुद्ध रूप से बेचे हैं। इसके साथ इस साल उनकी कुल निकासी ₹3.12 लाख करोड़ पहुंच गई है, जो पूरे 2025 में निकाले गए ₹1.66 लाख करोड़ का लगभग दोगुना है।

हालांकि बिकवाली की रफ्तार धीमी हुई है। 11 अक्टूबर को अक्टूबर का आंकड़ा ₹44,166 करोड़ था, यानी पिछले हफ्ते में करीब ₹8,000 करोड़ ही जुड़े, जो महीने के पहले दस दिनों की भारी निकासी से काफी कम है। शुक्रवार, 16 अक्टूबर को विदेशी फंड मामूली शुद्ध खरीदार बन गए।

पैसा क्यों निकल रहा है

वजहें सितंबर से ज़्यादा नहीं बदलीं। जुलाई और अगस्त में हल्की खरीदारी के बाद सितंबर में विदेशी निवेशकों ने ₹35,861 करोड़ के शेयर बेचे थे। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंची है, डॉलर मज़बूत है और पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण कच्चा तेल करीब 110 डॉलर प्रति बैरल पर है। अमेरिका में ज़िद्दी महंगाई ने फेडरल रिज़र्व की ओर से एक और दर बढ़ोतरी की चर्चा फिर छेड़ दी है, जिससे अमेरिकी संपत्तियां ज़्यादा आकर्षक हो गई हैं।

चॉइस वेल्थ के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी ऑफिसर धीरज गौड़ ने कहा, “ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, मज़बूत डॉलर और बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के बीच एफपीआई भारतीय शेयर बेचते रहे।” उन्होंने कहा कि महंगा कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा रहा है।

उत्तरी एशिया के बाज़ारों में एआई से जुड़े शेयरों की तेज़ी ने भी वैश्विक पैसा अपनी ओर खींचा है, जो वरना भारत आ सकता था।

शुक्रवार को क्या बदला

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी के विजयकुमार ने शुक्रवार की खरीदारी को “अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड में 5.3 प्रतिशत से ऊपर से 5.08 प्रतिशत तक की मामूली गिरावट” और डॉलर के मुकाबले रुपये की मज़बूती से जोड़ा। पिछले हफ्ते रुपया लगातार छह सत्रों में मज़बूत हुआ।

उन्होंने कहा कि विदेशी निवेशक अब भी वित्तीय सेवाओं और तेल से जुड़े शेयर बेच रहे हैं, जबकि उपभोक्ता सेवाओं, डिजिटल प्लेटफॉर्म, मनोरंजन, रेस्तरां और स्वास्थ्य सेवाओं में खरीद रहे हैं।

बजाज ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट (रिसर्च) पबित्रो मुखर्जी ने कहा कि बिकवाली में तेज़ कमी और शुक्रवार का पलटाव बताता है कि धारणा संभल रही है। उन्होंने चेताया कि ऊंची कच्चे तेल की कीमतें किसी भी सुधार के लिए सबसे बड़ा खतरा बनी हुई हैं। विश्लेषक आम तौर पर शुक्रवार की खरीदारी को स्थायी बदलाव के बजाय सामरिक कदम मान रहे हैं।

16 अक्टूबर को खत्म हफ्ते के एक्सचेंज आंकड़ों में विदेशी संस्थागत निवेशक ₹15,440 करोड़ के शुद्ध बिकवाल रहे, जबकि म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियों जैसे घरेलू संस्थानों ने ₹14,792 करोड़ की खरीदारी कर इसकी लगभग पूरी भरपाई कर दी। इसी घरेलू सहारे की बदौलत सेंसेक्स हफ्ते में 3.1% चढ़ पाया।

आगे किस पर नज़र

आने वाले दिनों में ब्रेंट क्रूड, अमेरिका-ईरान तनाव और सितंबर तिमाही के नतीजे विदेशी पैसे की दिशा तय करेंगे। 21 अक्टूबर को खुलने वाला ₹30,200 करोड़ का जियो प्लेटफॉर्म्स आईपीओ यह परखेगा कि बड़े भारतीय इश्यू में विदेशी फंडों की कितनी दिलचस्पी बची है।