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आरबीआई मिनट्स: ब्याज दर में कटौती फिलहाल नहीं, मल्होत्रा बोले महंगाई फैल रही है
इस महीने रेपो रेट में चौथाई फीसदी बढ़ोतरी का सभी छह सदस्यों ने समर्थन किया, लेकिन दो बाहरी सदस्यों ने सख्ती वाले रुख का विरोध किया। गवर्नर ने कहा कि अगला कदम बढ़ोतरी या ठहराव ही हो सकता है।
मुख्य बातें
- एमपीसी के सभी छह सदस्यों ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के पक्ष में वोट दिया, फरवरी 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी।
- नागेश कुमार और राम सिंह ने तटस्थ रुख से सधी हुई सख्ती की ओर बदलाव का विरोध किया।
- आरबीआई को उम्मीद है कि खुदरा महंगाई अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में 6% तक पहुंचेगी।
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस महीने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) में अपने साथियों से कहा कि फिलहाल ब्याज दरों में कटौती का सवाल नहीं है और अगला कदम बढ़ोतरी या ठहराव ही हो सकता है। बुधवार को जारी बैठक के मिनट्स में यह बात सामने आई।
समिति ने 7 अक्टूबर को 6-0 से रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.5% करने का फैसला किया था, जो फरवरी 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी है। आगे के रास्ते पर मिनट्स में साफ मतभेद दिखते हैं। तीन बाहरी सदस्यों में से दो, नागेश कुमार और राम सिंह, रुख को तटस्थ रखना चाहते थे, लेकिन समिति ने 4-2 से “सधी हुई सख्ती” (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) का रुख अपनाया।
गवर्नर की दलील
मल्होत्रा का तर्क था कि कीमतों का दबाव अब कुछ चीज़ों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कहा कि “महंगाई के फैलाव के बढ़ते संकेत” हैं। उन्होंने बताया कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की 37% वस्तुओं और सेवाओं में अगस्त में महंगाई 4% से ऊपर थी, जबकि मार्च में यह हिस्सा 20% था।
उन्होंने कहा कि सख्ती का दौर कितना लंबा और कितना बड़ा होगा, यह आंकड़ों पर निर्भर करेगा, खासकर बुनियादी महंगाई, कीमतों के बढ़ते फैलाव और आपूर्ति झटकों के दूसरे दौर के असर पर।
मौद्रिक नीति की प्रभारी डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि महंगाई का बड़ा हिस्सा बाहरी आपूर्ति झटकों से आ रहा है और अभी इसके जड़ जमाने के ज़्यादा संकेत नहीं हैं। फिर भी उन्होंने बढ़ोतरी का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “मैं इस नीति में पॉलिसी रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाने के पक्ष में हूं।” उनका कहना था कि जब मुख्य महंगाई 6% की ओर बढ़ रही हो, तब आरबीआई को फैलाव के पक्के सबूत का इंतज़ार नहीं करना चाहिए।
कार्यकारी निदेशक इंद्रनील भट्टाचार्य ज़्यादा सीधे थे। मज़बूत मांग और पैसे व कर्ज़ में तेज़ बढ़ोतरी को देखते हुए उन्होंने कहा कि समिति को “‘सावधानी के झुकाव’ को किनारे रखकर पहले से कदम उठाना चाहिए।”
बाहरी सदस्य
बाहरी सदस्य सौगत भट्टाचार्य ने कहा कि “कीमतों का दबाव अर्थव्यवस्था में जड़ जमा रहा है”, और थोक सूचकांक में इनपुट कीमतें एक साल पहले के मुकाबले करीब 9% बढ़ी हैं।
नागेश कुमार ने कमज़ोर मानसून, महंगे कच्चे तेल, कीमती धातुओं के ऊंचे भाव और कमज़ोर रुपये को दबाव की वजह बताया। उन्होंने महंगाई को मुख्य रूप से आपूर्ति से जुड़ा बताया और कहा कि अर्थव्यवस्था में ज़्यादा गर्मी के संकेत नहीं हैं, लेकिन “महंगाई की उम्मीदों को संभालना ज़रूरी है।” राम सिंह ने कहा कि वास्तविक रेपो रेट के लिहाज़ से सधी हुई बढ़ोतरी ज़रूरी है, साथ ही उन्होंने समिति से यह बारीकी से देखने को कहा कि महंगाई कितनी फैल रही है।
इसका मतलब
आरबीआई ने 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान 5% से बढ़ाकर 5.2% और विकास दर का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया है। उसे उम्मीद है कि खुदरा महंगाई अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में 2-6% के दायरे की ऊपरी सीमा 6% तक पहुंचेगी और जनवरी-मार्च में घटकर 5.7% रहेगी।
सितंबर में प्याज़ और दूसरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों के चलते खुदरा महंगाई 5.54% और थोक महंगाई 11.39% रही। रुख अब सख्ती की ओर झुका होने से 2 से 4 दिसंबर की बैठक में दूसरी बढ़ोतरी का रास्ता खुला है, अगर अक्टूबर और नवंबर के महंगाई आंकड़े आरबीआई के अनुमान के मुताबिक आते हैं।