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रायहमारा मत

नियम सख्त हों, उससे पहले डेटा संरक्षण बोर्ड में नियुक्तियां हों

देश का डेटा नियामक लगभग 11 महीने से कानून में मौजूद है, पर उसमें एक भी सदस्य नहीं है। सरकार को इसी साल नियुक्तियां कर देनी चाहिए, ताकि बोर्ड मई 2027 से काफी पहले तैयार हो।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित
स्मार्टफोन इस्तेमाल करता एक व्यक्ति
स्मार्टफोन इस्तेमाल करता एक व्यक्तिEsquilo / Wikimedia

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) नियम नवंबर 2025 में अधिसूचित हुए, और डेटा संरक्षण बोर्ड के गठन से जुड़े प्रावधान उसी दिन लागू हो गए। लगभग 11 महीने बाद भी बोर्ड का न कोई अध्यक्ष है, न कोई सदस्य। इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (मेइटी) ने 6 मई 2026 को आवेदन मांगे थे। पांच महीने बीत गए, किसी का नाम तय नहीं हुआ।

सरकार को साल खत्म होने से पहले ये नियुक्तियां कर देनी चाहिए।

कागज़ पर नियामक

जिस बोर्ड में सदस्य ही न हों, वह न कोई शिकायत सुन सकता है, न कोई आदेश दे सकता है। अब तक इससे खास फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि नियम चरणों में लागू हो रहे हैं। फर्क 13 नवंबर से पड़ना शुरू होगा, जब सहमति प्रबंधक व्यवस्था शुरू होगी। सहमति प्रबंधक वे कंपनियां हैं जो कई सेवाओं में लोगों की सहमति को संभालेंगी और उसका प्रबंधन करेंगी, और वे बोर्ड की निगरानी में काम करेंगी।

13 मई 2027 से यह कमी कहीं ज़्यादा भारी पड़ेगी। उस दिन से कंपनियों पर ज़्यादातर दायित्व लागू हो जाएंगे, और बोर्ड को उल्लंघनों की जांच करने और ₹250 करोड़ तक का जुर्माना लगाने के अधिकार मिल जाएंगे। कंपनियों को डेटा उल्लंघन की सूचना भी बोर्ड को देनी होगी।

किसी नियामक को इन अधिकारों का ठीक से इस्तेमाल करने लायक बनने में समय लगता है। उसे कर्मचारी चाहिए, रजिस्ट्री चाहिए, सुनवाई की प्रक्रियाएं चाहिए, और वह डिजिटल शिकायत प्रणाली चाहिए जिसका सरकार ने वादा किया है। लोगों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे ऐसी संस्था पर भरोसा करें जिसके दरवाज़े उसी दिन खुलें जिस दिन जुर्माने शुरू हों।

सरकार का सबसे मज़बूत तर्क

अब तक की रफ्तार के पक्ष में एक वाजिब तर्क है। चरणबद्ध ढांचा कंपनियों को तैयारी के लिए 18 महीने देता है, और पहले साल जब लागू करने को खास कुछ था ही नहीं, तब बोर्ड के पास भी करने को कम ही होता। एक नए नियामक के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन दो खोज-सह-चयन समितियों के ज़रिए होता है, जिनमें से एक की अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करते हैं, और इसमें सावधानी लगती है। जल्दबाज़ी में गलत लोगों की नियुक्ति लंबे समय तक नुकसान करेगी।

यह तर्क कुछ महीनों तक टिकता है। हर बीतते महीने के साथ यह कमज़ोर होता जाता है। चयन प्रक्रिया मई में शुरू हुई, और पदों का विज्ञापन जून में आया। सहमति प्रबंधकों के काम शुरू करने से पहले भी बोर्ड में सदस्य होने चाहिए, क्योंकि वे उसकी निगरानी में आते हैं। और लाइवलॉ के अनुसार, कानून कहता है कि कम से कम एक सदस्य के पास कानूनी विशेषज्ञता हो, साथ में डेटा गवर्नेंस, विवाद समाधान, प्रौद्योगिकी या डिजिटल अर्थव्यवस्था की जानकारी भी। ऐसे लोगों की खोज कुछ महीनों में हो सकती है।

स्वतंत्रता की शुरुआत नियुक्ति से

बोर्ड कैसे भरा जाता है, यह उतना ही अहम है जितना यह कि कब। बोर्ड उन संगठनों के खिलाफ शिकायतों पर फैसला करेगा जो लोगों का व्यक्तिगत डेटा जुटाते और प्रोसेस करते हैं, और इनमें से कुछ बहुत बड़े हैं। उसकी साख इस बात पर टिकी है कि लोग मानें कि वह बिना डरे काम करेगा।

सरकार प्रक्रिया को लेकर पारदर्शी रहकर इसमें मदद कर सकती है: उसे कितने आवेदन मिले, दोनों चयन समितियों में कौन है, और वह प्रक्रिया कब तक पूरी होने की उम्मीद करती है। इनमें से कुछ भी बताने से व्यक्तियों के चयन पर कोई आंच नहीं आएगी।

इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग

  • नवंबर 2025डीपीडीपी नियम अधिसूचित होने के साथ बोर्ड कानून में गठित हुआ
  • 5 में से 0अगस्त 2026 तक भरे गए अध्यक्ष और सदस्यों के पद; उसके बाद कोई नियुक्ति रिपोर्ट नहीं हुई
  • ₹250 करोड़13 मई 2027 से बोर्ड जितना अधिकतम जुर्माना लगा सकता है

सरकार को क्या करना चाहिए

मेइटी को 31 दिसंबर 2026 तक अध्यक्ष और चार सदस्यों के नाम घोषित कर देने चाहिए। इससे 13 मई 2027 से पहले बोर्ड को कर्मचारी भर्ती करने, अपनी प्रक्रियाएं प्रकाशित करने और शिकायत पोर्टल को परखने के लिए करीब साढ़े चार महीने मिलेंगे।

तब तक मेइटी को चयन प्रक्रिया पर हर महीने एक छोटा स्थिति नोट जारी करना चाहिए। जिन लोगों से जल्द ही अपनी शिकायतों के लिए इस नियामक पर भरोसा करने को कहा जाएगा, उन्हें कम से कम इसे बनते हुए देखने का हक तो है।

मूल दस्तावेज़