समझिएलद्दाख
अनुच्छेद 371-के क्या है: केंद्र ने लद्दाख को क्या पेशकश की, और लेह-करगिल ने क्यों ठुकराई
गृह मंत्रालय के मसौदे में लद्दाख के लिए संविधान में अलग विशेष अनुच्छेद और पूरे केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक निर्वाचित निकाय का प्रस्ताव है। लद्दाख के नेताओं ने इसे कुछ ही घंटों में खारिज कर दिया। अनुच्छेद 371 क्या है, छठी अनुसूची से यह कैसे अलग है, और 22 अक्टूबर की बातचीत में क्या तय होना बाकी है।
संक्षेप में
अनुच्छेद 371 संविधान के उन विशेष प्रावधानों का समूह है जो नगालैंड, सिक्किम और मिज़ोरम जैसे खास राज्यों के स्थानीय कानूनों, रीति-रिवाजों और ज़मीन की रक्षा करते हैं। केंद्र ने लद्दाख के लिए नया अनुच्छेद 371-के और उसके बाद अनुच्छेद 240 के तहत राष्ट्रपति का विनियम लाने की पेशकश की है, ताकि केंद्र शासित प्रदेश के लिए ज़मीन, प्राकृतिक संसाधनों और संस्कृति की सुरक्षा के साथ एक सीधे चुना हुआ निकाय बने। लेह एपेक्स बॉडी और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस का कहना है कि यह उनकी मांग से कम है: वे छठी अनुसूची का संरक्षण और असली विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियों वाली विधायिका चाहते हैं। बातचीत 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में फिर शुरू होगी।
केंद्र ने क्या पेशकश की है?
लद्दाख के लिए संविधान में एक विशेष अनुच्छेद, और पूरे केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक निर्वाचित निकाय।
16 अक्टूबर को गृह मंत्रालय ने लद्दाख के दो प्रमुख राजनीतिक समूहों को 32 पन्नों का एक ढांचा सौंपा। यह दो चरणों में काम करता है। पहले संसद संविधान संशोधन करके लद्दाख के लिए नया अनुच्छेद 371-के जोड़ेगी। फिर राष्ट्रपति अनुच्छेद 240 के तहत विनियम जारी करके ब्योरा तय करेंगे: केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक सीधे चुना हुआ निकाय, जिसमें ज़मीन, प्राकृतिक संसाधनों और संस्कृति की सुरक्षा हो।
बहुत कुछ अभी खुला है। लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने शनिवार को खुद ये कमियां गिनाईं: निकाय का नाम और ढांचा, सदस्य कैसे और किसके ज़रिए चुने जाएंगे, महिलाओं और छोटे समुदायों के लिए सीटें, मनोनीत सदस्य, परिसीमन, मतदाता सूची, कार्यकाल, और यह हिल काउंसिलों, पंचायतों व नगरपालिकाओं के साथ कैसे काम करेगा। उन्होंने कहा, “हर ब्योरा संविधान संशोधन में शामिल नहीं किया जा सकता।”
अनुच्छेद 371 क्या है?
खास राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों का समूह, जिन्हें एक-एक करके संविधान में जोड़ा गया।
अनुच्छेद 371 और 371ए से 371जे तक अलग-अलग राज्यों को ऐसी सुरक्षा देते हैं जो देश के बाकी हिस्सों के पास नहीं है। सबसे चर्चित प्रावधान पूर्वोत्तर के हैं। नगालैंड के लिए अनुच्छेद 371ए और मिज़ोरम के लिए अनुच्छेद 371जी कहते हैं कि लोगों की धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं, प्रथागत कानून, या ज़मीन के स्वामित्व और हस्तांतरण पर संसद का कोई कानून वहां तब तक लागू नहीं होगा, जब तक राज्य विधानसभा ऐसा तय न करे। अनुच्छेद 371एफ ने वे शर्तें तय कीं जिन पर सिक्किम 1975 में भारत में शामिल हुआ।
मई में केंद्र और लद्दाख के नेता सैद्धांतिक रूप से इस पर सहमत हुए थे कि लद्दाख को अनुच्छेद 371ए, 371एफ और 371जी की तर्ज़ पर सुरक्षा दी जाएगी। लेह और करगिल के नेता अब इसी पैमाने पर मसौदे को परख रहे हैं।
और छठी अनुसूची?
यह एक अलग और पुराना मॉडल है, जो जनजातीय स्वशासन पर टिका है।
अनुच्छेद 244(2) और 275(1) के तहत छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय इलाकों पर लागू होती है। वहां 10 स्वायत्त ज़िला परिषदें हैं, हर एक में अधिकतम 30 सदस्य, जिनमें 26 चुने हुए। ये ज़मीन, जंगल, पानी, गांव के प्रशासन, उत्तराधिकार, विवाह और सामाजिक रीति-रिवाजों पर कानून बना सकती हैं, ग्राम अदालतें चला सकती हैं, और प्राथमिक स्कूल, बाज़ार और सड़कें संभाल सकती हैं। संसद या राज्य के कानून इन इलाकों में बदलाव के साथ ही लागू होते हैं, या बिल्कुल नहीं।
लद्दाख के 97% से ज़्यादा लोग अनुसूचित जनजातियों के हैं। इसीलिए 2019 में बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) छठी अनुसूची की मांग कर रहे हैं। उनकी बाकी मांगें हैं: राज्य का दर्जा, लेह और करगिल के लिए अलग लोकसभा सीटें, और खाली सरकारी पदों पर भर्ती।
लद्दाख की सुरक्षा के तीन रास्ते
अनुच्छेद 240 क्या है, और यहां इसकी अहमियत क्यों है?
यह राष्ट्रपति को कुछ केंद्र शासित प्रदेशों के लिए विनियम से कानून बनाने का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 240 के तहत बने विनियम संसद के कानून जितने प्रभावी होते हैं और मौजूदा कानूनों को बदल या रद्द कर सकते हैं। केंद्र लद्दाख में यह रास्ता पहले ही अपना चुका है। जून 2025 में उसने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा 85% तय की, 15 साल का अधिवास नियम बनाया, अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, भोटी और पुर्गी को आधिकारिक भाषाएं घोषित किया, और हिल काउंसिल की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कीं।
लेह और करगिल की चिंता यह है कि जो एक विनियम देता है, दूसरा छीन सकता है। नए निकाय की शक्तियां संविधान संशोधन के बजाय विनियम में रखने से ब्योरा केंद्र के हाथ में रहता है।
एलएबी और केडीए ने मसौदा क्यों ठुकराया?
उनका कहना है कि उन्हें जो वादा किया गया था, यह उससे कम है।
केडीए के सह-अध्यक्ष असगर अली करबलाई ने कहा कि गृह मंत्रालय मई की सहमति से “पीछे हट गया” है और प्रस्तावित निकाय मौजूदा हिल काउंसिलों से भी नीचे होगा। उन्होंने इसे “अच्छा संकेत नहीं” बताया। दोनों समूह विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियों वाली विधायिका चाहते हैं, कोई सलाहकार या प्रशासनिक निकाय नहीं।
कुंद्रा ने कहा कि दस्तावेज़ का “मिलने के महज़ दो घंटे के भीतर” खारिज होना हैरान करने वाला था, और केंद्र बदलावों पर विचार को तैयार है। उन्होंने कहा, “किसी के लिए उम्मीद छोड़ने की कोई वजह नहीं है।”
माहौल इतना तनावपूर्ण क्यों है?
क्योंकि बातचीत सालों से चल रही है, और लद्दाख इस पर हिंसा देख चुका है।
सितंबर 2025 के आखिर में लेह में प्रदर्शन हिंसक हो गए: चार लोग मारे गए और करीब 150 घायल हुए। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जिन्होंने 10 सितंबर को एलएबी और केडीए की ओर से अनशन शुरू किया था, 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिए गए। महीनों बाद बातचीत फिर शुरू हुई और मई की सहमति बनी।
इस बीच केंद्र लद्दाख की संस्थाओं को अपने स्तर पर बदलता रहा है। अप्रैल में पांच नए ज़िले बनाए गए, जिससे कुल संख्या सात हो गई, और इसी हफ्ते हिल काउंसिल के नियम बदले गए, ताकि प्रशासन चुनी हुई सीटों की संख्या 7 से 24 के बीच तय कर सके और चुनाव अव्यावहारिक माने जाने पर काउंसिल का कार्यकाल बढ़ा सके।
आगे क्या?
दोनों पक्ष 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में मिलेंगे। सवाल यह है कि क्या केंद्र नए निकाय की शक्तियों को संविधान के पाठ में ले जाएगा, और क्या लेह और करगिल छठी अनुसूची से कम कुछ स्वीकार करेंगे।