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ट्रंप की रूस प्रतिबंध छूट: क्या भारत 100% टैरिफ के खतरे से बाहर है?

पिछले महीने बने एक अमेरिकी कानून ने 18 अक्टूबर से रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदारों पर 100% टैरिफ का खतरा खड़ा किया था, भारत भी उनमें शामिल था। शुक्रवार रात राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे टाल दिया। कानून क्या कहता है, छूट क्या करती है, और खतरा पूरी तरह क्यों नहीं टला।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

18 सितंबर को बने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट में रूसी सामान पर 500% टैरिफ और 18 अक्टूबर के बाद भी खरीद जारी रखने वाले रूसी तेल और गैस के पांच सबसे बड़े आयातकों पर 100% टैरिफ का प्रावधान था, साथ में व्यापक प्रतिबंध भी। 16 अक्टूबर के आदेश में ट्रंप ने प्रमाणित किया कि इन दंडों में छूट अमेरिका के 'राष्ट्रीय हित' में है, और टैरिफ व मुख्य प्रतिबंध दोनों हटा दिए। भारत के लिए तात्कालिक खतरा टल गया है। लेकिन कानून बना हुआ है, और छूट तभी तक है जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री कुछ और तय न करें।

ग्राहम एक्ट क्या है?

रूस की तेल कमाई पर शिकंजा कसने के लिए बना अमेरिकी कानून, जो रूस और उससे खरीदने वाले देशों को सज़ा देता है।

लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, जिसका नाम इसके पैरोकार रहे दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर पर है, अगस्त में सीनेट से 86 के मुकाबले 11 वोटों से पास हुआ और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर को इस पर दस्तखत किए। इसके दो तरह के दांत हैं।

पहला है टैरिफ। कानून में रूसी सामान पर 500% टैरिफ, और रूसी कच्चे तेल और गैस के पांच सबसे बड़े आयातकों के सामान पर, अगर वे खरीद जारी रखें, 100% तक टैरिफ का प्रावधान है। यह सूची हर छह महीने में दोबारा बनती है। रूस को प्रतिबंधों से बचने में सबसे ज़्यादा मदद करने वाले पांच देशों पर अलग से 100% टैरिफ लग सकता है। रूसी आपूर्ति में अच्छी-खासी कटौती करने वाले गैस खरीदारों को छूट मिल सकती है।

दूसरा है प्रतिबंध: रूस के ज़्यादातर राजनीतिक नेतृत्व, उसकी ऊर्जा और रक्षा कंपनियों, बैंकों और उसके तेल ढोने वाले टैंकरों के “शैडो फ्लीट” पर रोक, और रूस में अमेरिकी निवेश पर पाबंदी।

भारत निशाने पर क्यों था?

क्योंकि वह रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदारों में है।

शिपिंग डेटा फर्म केप्लर के मुताबिक अगस्त में भारत ने रोज़ाना करीब 20.8 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल आयात किया, जो उसके कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 45% है। इससे भारत चीन के साथ शीर्ष पांच आयातकों में आता है। दंड 18 अक्टूबर, यानी आज या उसके बाद की खरीद पर लागू होने थे।

कानून पास होने पर नई दिल्ली ने आपत्ति जताई थी। विदेश मंत्रालय ने 17 सितंबर को कहा था कि भारत “अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है”। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 23 सितंबर को न्यूयॉर्क में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के सामने यह कानून उठाया।

ट्रंप के आदेश ने क्या किया?

पहले दंड गिनाए, फिर लगभग सभी बंद कर दिए।

16 अक्टूबर का यह आदेश, जो वॉशिंगटन में शुक्रवार देर रात जारी हुआ, कानून के तहत तय शुल्क गिनाता है: रूसी सामान पर 500% और शीर्ष आयातकों और मददगारों के सामान पर 100%। फिर उन्हें, कानून के मुख्य प्रतिबंध प्रावधानों के साथ, माफ कर देता है। कानून राष्ट्रपति को ऐसा करने देता है अगर वे कांग्रेस को प्रमाणित करें कि छूट अमेरिका के “राष्ट्रीय हित” में है और कारण बताएं। ट्रंप ने यही किया।

दो चीज़ें बची रहती हैं। रूस से जुड़ी मौजूदा राष्ट्रीय आपातस्थिति के तहत पहले से लगे प्रतिबंध जस के तस हैं। और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को रूसी तेल खरीदने वालों पर नज़र रखकर रिपोर्ट देनी होगी।

छूट से पहले और बाद में ग्राहम एक्ट

कानून का प्रावधान16 अक्टूबर के आदेश के बाद
रूसी सामान पर टैरिफ
500%
माफ
रूसी तेल-गैस के शीर्ष पांच खरीदार
18 अक्टूबर से नई खरीद पर 100% तक
माफ
बैंकों, ऊर्जा कंपनियों, शैडो फ्लीट पर प्रतिबंध
अनिवार्य
मुख्य प्रावधान माफ; पुराने प्रतिबंध कायम
रूसी तेल खरीदारों की निगरानी
यूएसटीआर नज़र रखे और रिपोर्ट दे
जारी

उन्होंने ऐसा क्यों किया?

आदेश सिर्फ औपचारिक कारण देता है: “राष्ट्रीय हित”।

यह छूट ऐसे समय आई है जब व्हाइट हाउस मॉस्को के साथ अपनी कूटनीति चला रहा है, जिसमें रूस और यूक्रेन के बीच उसका घोषित ऊर्जा संघर्ष-विराम भी शामिल है। रूस ने इसका स्वागत किया: दूत किरिल दिमित्रिएव ने इसे “एक अहम और सचमुच ऐतिहासिक क्षण” कहा। कानून के डेमोक्रेटिक सह-लेखक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने इसे “कायराना” बताया, और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने कहा कि इसका मतलब “पुतिन के लिए आर्थिक इनाम” है।

तो क्या भारत बच गया?

फिलहाल हां। हमेशा के लिए नहीं।

छूट से भारत के सबसे बड़े बाज़ार अमेरिका को होने वाले निर्यात पर मंडराता तात्कालिक खतरा हट गया है। लेकिन यह तभी तक लागू है जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री कुछ और तय न करें, और कानून खुद बना हुआ है। रूसी तेल खरीदारों की निगरानी जारी है, यानी अगर वॉशिंगटन का मन बदला तो निशानों की सूची तैयार होगी।

इससे भारत वहीं खड़ा है जहां पूरे साल रहा है: सस्ते रूसी तेल और अमेरिकी बाज़ार तक पहुंच के बीच संतुलन साधते हुए, जबकि वॉशिंगटन के साथ व्यापार वार्ता अटकी है। अमेरिका का रुख समझने का अगला मौका 20 अक्टूबर को रुबियो की जयशंकर से बातचीत के लिए मुंबई यात्रा होगी। रविवार सुबह तक भारत सरकार ने छूट पर कोई टिप्पणी नहीं की थी।

मूल दस्तावेज़