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बांदीपुर के खाली पद एक चेतावनी हैं। सिर्फ कागज़ पर मौजूद वन बल बाघों को नहीं बचा सकता

भारत के सबसे अच्छे टाइगर रिज़र्व में से एक में फॉरेस्ट वॉचर के 206 में से सिर्फ 12 पद भरे हैं। कर्नाटक, और टाइगर रिज़र्व वाला हर राज्य, जंगल में गश्त करने वालों की भर्ती करे, उन्हें प्रशिक्षण और सही वेतन दे, इससे पहले कि शिकारी इस कमी को भांप लें।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित
कर्नाटक के बांदीपुर नेशनल पार्क में गोपालस्वामी बेट्टा पहाड़ी (फ़ाइल फ़ोटो)
कर्नाटक के बांदीपुर नेशनल पार्क में गोपालस्वामी बेट्टा पहाड़ी (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Yathin S Krishnappa / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0

जब भारत दुनिया को दिखाना चाहता है कि बाघ संरक्षण काम करता है, तो बांदीपुर उन जगहों में है जिनकी ओर वह इशारा करता है। 2022 की गणना में इस रिज़र्व में करीब 150 बाघ गिने गए, जो कर्नाटक के 563 बाघों का हिस्सा हैं। यह कामयाबी अब लोगों की बेहद पतली कतार पर टिकी है।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की समीक्षा में पाया गया है कि बांदीपुर के 630 स्वीकृत पदों में से 402 खाली हैं। जिन 206 फॉरेस्ट वॉचरों की ज़रूरत है, उनमें से 12 तैनात हैं। बीट फॉरेस्टर के आधे से ज़्यादा पद खाली हैं। शिकारियों से बचाव के लिए बनाया गया विशेष बाघ संरक्षण बल (एसटीपीएफ) अपनी क्षमता के करीब छठे हिस्से पर काम कर रहा है। प्राधिकरण चाहता है कि राज्य इन पदों को भरने के लिए “तुरंत कदम उठाए”। वह सही है, और कर्नाटक को इसे आपात स्थिति मानना चाहिए।

जो लोग सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं

वॉचर और बीट फॉरेस्टर दफ्तर में बैठने वाले कर्मचारी नहीं हैं। वे हर दिन जंगल की बीट पर पैदल चलते हैं, फंदे खोजते हैं, जानवरों पर नज़र रखते हैं, सूखे महीनों में आग बुझाते हैं, और जब कोई हाथी या बाघ गांव में भटक आता है तो अक्सर सबसे पहले वही पहुंचते हैं। कैमरा ट्रैप और ड्रोन मदद करते हैं, लेकिन वे किसी को गिरफ्तार नहीं करते। जिस रिज़र्व में पैदल गश्त करने वाले बहुत कम हों, वहां कोई शिकारी हफ्तों तक बिना दिखे काम कर सकता है।

बांदीपुर अकेला मामला नहीं है। पिछले साल कर्नाटक वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया था कि पूरे विभाग में अग्रिम पंक्ति के करीब आधे पद खाली हैं, जिनमें राज्य भर में वॉचर के कम से कम 60% पद शामिल हैं। सरकार ने फॉरेस्ट गार्ड के 540 पद मंज़ूर किए थे, जिन्हें खुद अधिकारियों ने बहुत कम बताया, और मंत्री की सलाह थी कि आउटसोर्स मज़दूरों से काम चलाया जाए।

एक जायज़ आपत्ति

राज्य कहेंगे कि भर्ती में समय लगता है, बजट तंग है और आरक्षण के नए नियमों ने नियुक्तियां धीमी कर दी हैं। यह सब सच है। दूरदराज़ इलाकों में वन पद भरना मुश्किल है, और नए भर्ती युवा अक्सर बेहतर नौकरी के लिए छोड़ जाते हैं।

लेकिन इसका जवाब यह नहीं हो सकता कि कमी को अस्थायी हाथों से भरकर उम्मीद की जाए। बाघ प्राधिकरण के अपने मूल्यांकनों के मुताबिक असम के कुछ रिज़र्वों में अग्रिम पंक्ति के आधे तक कर्मचारी होमगार्ड या दिहाड़ी मज़दूर हैं, जिन्हें ₹6,000 से ₹9,000 महीना मिलता है, अक्सर देर से, और जिनके पास अपराध दर्ज करने का कानूनी अधिकार नहीं है। अगस्त 2024 में उनमें से एक, होमगार्ड धनमणि डेका, ओरांग में बाघ के हमले में मारे गए। उनके एक अस्थायी साथी ने बताया कि वे “एक लाठी और एक खुखरी” लेकर गश्त करते हैं।

राज्यों को क्या करना चाहिए

पहला, टाइगर रिज़र्व वाला हर राज्य हर साल अग्रिम पंक्ति के खाली पदों का ब्योरा रिज़र्ववार सार्वजनिक करे, ताकि कमी पूरे विभाग के औसत में छिप न सके।

दूसरा, भर्ती किसी चेतावनी के बाद घोषित होने वाली कभी-कभार की मुहिम की जगह तय वार्षिक कैलेंडर पर हो, और विशेष बाघ संरक्षण बल के पदों को प्राथमिकता मिले।

तीसरा, जो लोग पहले से अनुबंध पर यह काम कर रहे हैं, उन्हें सही और समय पर वेतन, वर्दी, फील्ड उपकरण और बीमा मिले, और स्थायी पदों तक पहुंचने का उचित रास्ता भी।

चौथा, केंद्र टाइगर रिज़र्वों के लिए अपनी फंडिंग का एक हिस्सा स्टाफ की स्थिति से जोड़े, ताकि कोई राज्य जंगल को बिना पहरे के छोड़कर बढ़ती बाघ संख्या का श्रेय न ले सके।

एनटीसीए ने कर्नाटक से बांदीपुर के कोर क्षेत्र से पर्यटकों के रात्रि ठहराव हटाने को भी कहा है, जैसा सुप्रीम कोर्ट निर्देश दे चुका है। यह भी होना चाहिए। लेकिन अगर जंगल में उसे लागू कराने वाला कोई न हो, तो कोई नियम बाघ को नहीं बचाता।

इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग

  • 630 में 402स्वीकृत पद खाली हैं बांदीपुर टाइगर रिज़र्व में, एनटीसीए समीक्षा के मुताबिक
  • 206 में 12फॉरेस्ट वॉचर के पद ही भरे हैं बांदीपुर में
  • 563बाघ गिने गए कर्नाटक में 2022 के राष्ट्रीय आकलन में