रायहमारा मत
चुनाव नामांकन की मेज़ पर ही हारा जाता है। आंध्र का आयोग दिखाए कि हर उम्मीदवार वहां तक पहुंच सका
पुंगनूर में पलटी हुई एसयूवी, रायचोटी में जली कारें और पूरे राज्य में नामांकन पत्र छीने जाने के आरोपों ने आंध्र प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों की शुरुआत पर दाग लगा दिया है। 28 अक्टूबर को वोट पड़ने से पहले राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाताओं को सार्वजनिक हिसाब देना चाहिए कि किसे चुनाव लड़ने दिया गया।

आंध्र प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनाव यह तय करने के लिए थे कि राज्य के कस्बे और गांव कौन चलाएगा। अब खतरा है कि वे कुछ और बुरा तय कर दें: कि राज्य की राजनीति में चुनाव लड़ने का हक उसी का है जिसका नामांकन केंद्र के बाहर की सड़क पर कब्ज़ा हो।
शुक्रवार को नामांकन के पहले दिन ने ही रंग दिखा दिया। पुंगनूर में वाईएसआरसीपी सांसद पी वी मिधुन रेड्डी के काफिले की चार एसयूवी पलट दी गईं और कारें जला दी गईं। रायचोटी में वाईएसआरसीपी दफ्तर के पास गाड़ियों में आग लगा दी गई। दोनों पार्टियां उलटी कहानियां सुनाती हैं। वाईएसआरसीपी कहती है कि तेलुगु देशम पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पुलिस के सामने उसके उम्मीदवारों पर हमला किया। पुलिस कहती है कि सांसद के 10 से ज़्यादा गाड़ियों वाले काफिले ने गड़बड़ी की, और टीडीपी कहती है कि उसके नगर अध्यक्ष पर हमला हुआ।
रविवार को नामांकन बंद होने तक आरोप और बढ़ गए। वाईएसआरसीपी प्रमुख वाई एस जगनमोहन रेड्डी का कहना है कि आठ जगहों पर उनके उम्मीदवार नामांकन दाखिल ही नहीं कर पाए, आठ और जगहों पर उनके पर्चे फाड़ दिए गए, और उनके गृह नगर पुलिवेंदुला में 36 वार्डों के लिए सिर्फ 19 नामांकन हुए। उन्होंने राज्यपाल एस अब्दुल नज़ीर से केंद्रीय बल और हर बूथ पर कैमरे मांगे हैं।
वाजिब आपत्ति
ये एक हारी हुई पार्टी के दावे हैं, और इन्हें दावे की तरह ही देखा जाना चाहिए। आंध्र की राजनीति की याददाश्त लंबी है: जब वाईएसआरसीपी सत्ता में थी, तब टीडीपी ने स्थानीय चुनावों को लेकर लगभग ऐसी ही शिकायतें की थीं। सत्ता से बाहर की पार्टी के पास शोर मचाने की हर वजह होती है, और वाईएसआरसीपी के किसी खास आरोप की अभी जांच नहीं हुई है।
ठीक इसी वजह से राज्य निर्वाचन आयोग चुप नहीं रह सकता। जो आयोग कोई जवाब नहीं देता, वह मतदाताओं के सामने दो पक्षपाती कहानियां छोड़ देता है और कोई निर्णायक नहीं। और जिस चुनाव में उम्मीदवार नामांकन की मेज़ तक न पहुंच पाए, वह मतदान से पहले ही तय हो जाता है, सच चाहे कोई भी बोल रहा हो।
आयोग को क्या करना चाहिए
पहला, उसे शहरी चुनावों में दाखिल, खारिज या वापस लिए गए हर नामांकन की वार्डवार सूची, हर खारिज नामांकन की वजह के साथ, जारी करनी चाहिए। यह एक सूची जल्दी दिखा देगी कि विपक्ष की शिकायतें व्यापक हैं या कुछ कस्बों तक सीमित।
दूसरा, जहां कोई उम्मीदवार दिखा सके कि उसे शारीरिक रूप से नामांकन दाखिल करने से रोका गया, वहां आयोग को उस वार्ड में नामांकन बढ़ाने या दोबारा खोलने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए, भले ही वहां मतदान कुछ दिन आगे खिसकाना पड़े।
तीसरा, शिकायतों में नामित कस्बों, जैसे पुलिवेंदुला, पुंगनूर, रायचोटी और तिरुपति, में निर्विरोध जीते गए हर वार्ड की नतीजा घोषित होने से पहले जांच होनी चाहिए। निर्विरोध जीत तभी जायज़ है जब कोई लड़ना न चाहे, तब नहीं जब किसी को दरवाज़े से गुज़रने न दिया जाए।
चौथा, जिन नामांकन केंद्रों पर हिंसा हुई, वहां के प्रभारी पुलिस अधिकारियों की पहचान हो और जहां वे कार्रवाई करने में नाकाम रहे, उन्हें मतदान से पहले हटाया जाए। उन केंद्रों की वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाए और अदालतों को उपलब्ध कराई जाए।
आखिर में, ग्रामीण दौर अभी बाकी है। मंडल और ज़िला परिषद के नामांकन, और 2 दिसंबर को खत्म होने वाले ग्राम पंचायत चुनावों के तीन चरण, हज़ारों गांवों में इसी व्यवस्था की परीक्षा लेंगे। अगर शहरी दौर बिना जवाब के गुज़र गया, तो हर पार्टी अगले दौर के लिए साफ सबक निकाल लेगी।
100 शहरी निकायों में मतदान 28 अक्टूबर को है। आयोग के पास यह दिखाने के लिए नौ दिन हैं कि मतपत्र पर चुनाव मतदाताओं का ही है।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 8जगहें जहां वाईएसआरसीपी के मुताबिक उसके उम्मीदवार नामांकन दाखिल ही नहीं कर पाए
- 36 पर 19वाईएसआरसीपी के मुताबिक पुलिवेंदुला के 36 वार्डों के लिए दाखिल नामांकन
- 28 अक्टूबर100 शहरी स्थानीय निकायों में मतदान; नतीजे 30 अक्टूबर को