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आंध्र हाईकोर्ट ने स्थानीय निकायों में 34% बीसी आरक्षण रद्द किया, सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की

अदालत ने कहा कि ठोस आंकड़ों के बिना कुल आरक्षण 50% से ऊपर नहीं जा सकता और छह हफ्तों में चुनाव कराने का आदेश दिया। अब मुख्यमंत्री नायडू ने एनडीए के 34% टिकट बीसी उम्मीदवारों को देने का वादा किया है।

संपादकीय डेस्क से · अमरावतीप्रकाशित
अमरावती में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
अमरावती में आंध्र प्रदेश हाईकोर्टIM3847 / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. 1 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने वे दो आदेश रद्द कर दिए, जिनके तहत पिछड़े वर्गों को ग्रामीण स्थानीय निकायों की 34% और शहरी स्थानीय निकायों की 33.33% सीटें दी गई थीं।
  2. पीठ ने माना कि इन आरक्षणों से ठोस आंकड़ों के बिना कुल आरक्षण 50% की सीमा पार कर गया, और छह हफ्तों के भीतर चुनाव प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को राज्य की अपील खारिज कर दी और हाईकोर्ट के रुख को बहुत तर्कसंगत बताया।
  4. मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि एनडीए स्थानीय चुनावों में अपनी 34% सीटें बीसी उम्मीदवारों को देगा।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने 1 अक्टूबर को स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों (बीसी) के लिए राज्य का नया आरक्षण रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि इससे कुल आरक्षण सुप्रीम कोर्ट की तय की हुई 50% की सीमा से आगे चला गया। आठ दिन बाद सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने इस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया।

द साउथ फर्स्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश लिसा गिल और न्यायमूर्ति चल्ला गुणरंजन की खंडपीठ ने दो सरकारी आदेश रद्द किए: पंचायत राज विभाग का G.O.Ms.No.105, जिसके तहत ग्रामीण स्थानीय निकायों में बीसी को 34% सीटें दी गई थीं, और नगर प्रशासन विभाग का G.O.Ms.No.1065, जिसके तहत शहरी स्थानीय निकायों में उन्हें 33.33% सीटें मिली थीं। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने 18 अगस्त को इन आरक्षणों की घोषणा की थी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने विकास किशनराव गवली और जनहित अभियान मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य ठोस आंकड़े जुटाने के बाद 50% की सीमा के भीतर बीसी आरक्षण दे सकता है। अदालत ने पाया कि राज्य के एकीकृत परिवार सर्वेक्षण (यूनिफाइड फैमिली सर्वे) के आंकड़े 50% से ज़्यादा आरक्षण को सही नहीं ठहरा सकते, क्योंकि सरकार के पास इस काम के लिए वैज्ञानिक तरीके से जुटाए गए आंकड़े नहीं थे।

द साउथ फर्स्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य ने उसी सर्वेक्षण पर भरोसा किया था, जिसमें बीसी आबादी करीब 50.42% बताई गई, और साथ ही सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी राजीव रंजन मिश्रा की अध्यक्षता वाले आयोग के अध्ययन पर भी। डेक्कन क्रॉनिकल के मुताबिक, अदालत ने कहा कि वह आयोग के गठन की वैधता की जांच नहीं कर रही, क्योंकि उसके गठन को चुनौती नहीं दी गई थी।

अदालत ने सरकार और राज्य चुनाव आयोग को छह हफ्तों के भीतर चुनाव प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया। ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों का कार्यकाल मार्च और अप्रैल में खत्म हो चुका है। अदालत ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग का मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) इन चुनावों में बाधा नहीं है।

अदालत ने दूसरी याचिकाएं भी खारिज कर दीं। डेक्कन क्रॉनिकल के मुताबिक, इनमें एपी बीसी वेलफेयर यूनियन के अध्यक्ष केसना शंकर राव की जनहित याचिका शामिल थी, जिसमें बीसी जनगणना होने तक चुनाव टालने की मांग की गई थी। द साउथ फर्स्ट के मुताबिक, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की वह याचिका भी खारिज हुई, जिसमें मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के बाद ही चुनाव कराने की मांग थी।

आरक्षण और सीमा

  • 34%ग्रामीण स्थानीय निकायों में बीसी आरक्षण, रद्द
  • 33.33%शहरी स्थानीय निकायों में बीसी आरक्षण, रद्द
  • 50%कुल आरक्षण की सीमा, जिसे अदालत ने लागू किया
  • 6 हफ्तेस्थानीय निकाय चुनाव प्रक्रिया शुरू करने की समय सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की

द साउथ फर्स्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य ने 3 अक्टूबर को विशेष अनुमति याचिका दायर की। पीटीआई के मुताबिक, 9 अक्टूबर को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने इसे खारिज कर दिया और कहा कि हाईकोर्ट ने “तर्कसंगत आदेश पारित किया है”।

द साउथ फर्स्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दत्ता ने पूछा, “यह किस कानून के तहत किया जा रहा है?” और फिर कहा, “खारिज”। उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले को “हाईकोर्ट का बहुत तर्कसंगत रुख” बताया।

राज्य में इस तरह का यह पहला फैसला नहीं है। द साउथ फर्स्ट ने याद दिलाया कि 2 मार्च 2020 को हाईकोर्ट ने G.O.Ms.No.176 रद्द किया था, जिसके तहत स्थानीय निकायों में कुल आरक्षण 59.85% तक पहुंच गया था।

सरकार और पार्टियों की प्रतिक्रिया

द साउथ फर्स्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई से पहले केंद्रीय मंत्री राम मोहन नायडू ने कहा था कि राज्य ने 50% से आगे जाने को सही ठहराने के लिए अदालत के सामने पर्याप्त आंकड़े रखे हैं, और इस आरक्षण से बीसी उम्मीदवारों को करीब 16,800 स्थानीय पद मिलते।

अपील खारिज होने के बाद मुख्यमंत्री नायडू ने कहा कि एनडीए स्थानीय निकाय चुनावों में अपनी 34% सीटें बीसी उम्मीदवारों को देगा। आईएएनएस के मुताबिक, उन्होंने 9 अक्टूबर को प्रकाशम जिले के नरसिंगोलु में कहा, “फिर भी, एनडीए गठबंधन 34 प्रतिशत सीटें उन्हें देगा।” उन्होंने आगे कहा, “हमने उन्हें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ाने के लिए कई बदलाव लागू किए।” उन्होंने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि वह पहले की बढ़ोतरी रोकने के लिए अदालत गई थी।

बीसी संगठन अलग समाधान चाहते हैं। डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यसभा सदस्य और नेशनल बीसी वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष आर. कृष्णैया ने 14 बीसी संगठनों की ओर से राज्य से आग्रह किया कि वह संविधान संशोधन के लिए केंद्र पर दबाव डाले। उन्होंने 50% की सीमा के आधार पर सवाल उठाया और कहा कि कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का आरक्षण मिलाकर 70% से 90% तक पहुंच जाता है।