समझिएश्रम संहिताएं
चार श्रम संहिताएं: कामगारों और नियोक्ताओं के लिए क्या बदला
नवंबर 2025 में चार संहिताओं ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों की जगह ली। जानिए इनमें कामगारों से क्या वादे हैं, नियोक्ताओं से क्या अपेक्षा है, और इतना कुछ अब भी राज्यों पर क्यों टिका है।
संक्षेप में
वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता 21 नवंबर 2025 को लागू हुईं और इन्होंने 29 केंद्रीय कानूनों की जगह ली। इनमें कामगारों के लिए नियुक्ति पत्र, कानूनी न्यूनतम वेतन, एक साल बाद तय अवधि वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी और गिग कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा का वादा है, और नियोक्ताओं के लिए कागज़ी काम घटाया गया है। ये कैसे लागू होंगी, यह कुछ हद तक राज्यों के नियमों पर निर्भर है, जिन्हें अक्टूबर 2026 तक ज़्यादातर राज्यों ने अंतिम रूप नहीं दिया था।
चार श्रम संहिताएं क्या हैं?
ये चार कानून हैं जिन्होंने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों की जगह ली और 21 नवंबर 2025 को लागू हुए। वेतन संहिता, 2019 वेतन से जुड़ी है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 यूनियनों, हड़तालों, छंटनी और विवादों को देखती है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में भविष्य निधि, बीमा, ग्रेच्युटी और गिग कामगारों के लाभ आते हैं। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 काम के घंटों, सुरक्षा और कल्याण से जुड़ी है।
संसद ने ये संहिताएं 2019 और 2020 में पारित की थीं, लेकिन ये सरकार की अधिसूचना के बाद ही लागू हुईं। केंद्र ने चारों संहिताओं के तहत अपने नियम, मॉडल स्थायी आदेशों के साथ, 8 मई 2026 को अधिसूचित किए। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक, संसद ने फरवरी 2026 में औद्योगिक संबंध संहिता में संशोधन भी किया।
श्रम संहिताओं से कामगारों के लिए क्या बदला?
हर कामगार को नियुक्ति पत्र, कानूनी न्यूनतम वेतन और समय पर भुगतान मिलना है। केपीएमजी के सारांश के मुताबिक, संहिताएं लागू होने पर सरकार ने जो बदलाव गिनाए, उनमें ये शामिल हैं।
कामगारों के लिए दूसरे बदलाव ये हैं:
- तय अवधि के कर्मचारी एक साल की सेवा के बाद ग्रेच्युटी के हकदार होंगे, और उन्हें स्थायी कर्मचारियों जैसा वेतन और लाभ मिलेगा।
- नियोक्ताओं को 40 साल से ज़्यादा उम्र के कामगारों को हर साल मुफ्त स्वास्थ्य जांच की सुविधा देनी होगी।
- ईएसआईसी स्वास्थ्य बीमा का दायरा पूरे भारत में बढ़ाया गया है, और खतरनाक प्रक्रिया में एक भी कामगार वाले प्रतिष्ठानों के लिए यह अनिवार्य है।
- महिलाएं अपनी सहमति और सुरक्षा उपायों की शर्त पर रात की शिफ्ट में और हर तरह के काम में लग सकती हैं।
- आईटी और आईटी आधारित सेवाओं में वेतन हर महीने की सात तारीख तक देना होगा।
गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को क्या मिलेगा?
गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को सामाजिक सुरक्षा संहिता के दायरे में लाया गया है, और जिन कंपनियों के ज़रिए वे काम करते हैं, वे इसमें योगदान देंगी। केपीएमजी के मुताबिक एग्रीगेटर कंपनियों को अपने सालाना कारोबार का 1% से 2% योगदान देना है, जो इन कामगारों को किए गए भुगतान के 5% तक सीमित है।
केंद्रीय नियमों के तहत 16 साल या उससे ज़्यादा उम्र के हर गिग और प्लेटफॉर्म कामगार को आधार के साथ एक केंद्रीय पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा। शार्दुल अमरचंद मंगलदास के मुताबिक, लाभ पाने के लिए कामगार को पिछले वित्त वर्ष में एक एग्रीगेटर के साथ 90 दिन, या कई एग्रीगेटर के साथ कुल 120 दिन काम करना ज़रूरी है। 60 साल की उम्र पर लाभ बंद हो जाते हैं।
श्रम संहिताओं से नियोक्ताओं के लिए क्या बदला?
फॉर्म, रजिस्टर और रिटर्न बहुत कम हो गए हैं, लेकिन नियुक्ति पत्र, स्वास्थ्य जांच और योगदान से जुड़ी नई ज़िम्मेदारियां आई हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड द्वारा उद्धृत ग्रांट थॉर्नटन भारत की एक रिपोर्ट यह कमी गिनाती है।
शार्दुल अमरचंद मंगलदास के मुताबिक, जब कोई नियोक्ता किसी कामगार की छंटनी करता है, तो केंद्रीय औद्योगिक संबंध नियमों के तहत उसे हर छंटनी वाले कामगार के आखिरी वेतन के 15 दिन के बराबर रकम दस दिन के भीतर एक री-स्किलिंग फंड में जमा करनी होती है।
श्रम संहिताओं में राज्यों के नियम इतने अहम क्यों हैं?
श्रम समवर्ती सूची का विषय है, और ज़्यादातर मामलों में राज्य सरकारें ही उपयुक्त सरकार होती हैं, इसलिए कई प्रावधान राज्यों के नियमों के ज़रिए लागू होते हैं। 24 सितंबर 2026 को श्रम सचिव चंद्र भूषण कुमार ने कहा कि दस राज्यों ने अंतिम नियम प्रकाशित कर दिए हैं और बाकी ने मसौदा जारी किया है। केंद्र को उम्मीद है कि 31 अक्टूबर 2026 तक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नियम आ जाएंगे।
द ट्रिब्यून ने जुलाई में रिपोर्ट किया था कि केरल ने और समय मांगा था और पश्चिम बंगाल ने मसौदा नियम प्रकाशित नहीं किए थे।
क्या अलग-अलग राज्यों में श्रम संहिताओं के नियम अलग हैं?
हां, और इससे यह तय होता है कि कामगारों को क्या मिलेगा। शार्दुल अमरचंद मंगलदास के मुताबिक, कई राज्यों के सामाजिक सुरक्षा नियम तय अवधि के कर्मचारियों को एक साल बाद ग्रेच्युटी का हकदार बनाते हैं, लेकिन गुजरात के नियमों में पांच साल की शर्त है।
महिलाओं की रात की शिफ्ट के नियम भी अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों के नियम महिलाओं को सुबह 6 बजे से पहले और शाम 7 बजे के बाद काम करने की अनुमति देते हैं, बशर्ते लिखित सहमति हो, परिवहन, रोशनी और सीसीटीवी की व्यवस्था हो और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े कानून का पालन हो। बिहार में ड्यूटी पर कम से कम दो महिलाओं और उत्तर प्रदेश में कम से कम चार महिलाओं का होना ज़रूरी है।
श्रम संहिताओं में अब भी क्या तय होना बाकी है?
कई परिभाषाएं और कुछ समय-सीमाएं। ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट ने प्रबंधकीय, प्रशासनिक और पर्यवेक्षी पदों की परिभाषा न होने की ओर ध्यान दिलाया, और उस नियम पर सवाल उठाए जिसमें कामगार के नौकरी छोड़ने के दो कार्य दिवसों के भीतर अंतिम वेतन देना ज़रूरी है।
मंत्रालय एक “लेबर स्टैक” भी बना रहा है, यानी कामगारों के डेटाबेस और कल्याण योजनाओं को जोड़ने वाला एक प्लेटफॉर्म, जो असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों के लिए है। 24 सितंबर को कुमार ने कहा कि करीब 15 दिन में इसका पायलट शुरू होने की उम्मीद है।
श्रम संहिताएं: अहम तारीखें
- 2019–2020संसद ने चारों संहिताएं पारित कीं
- 21 नवंबर 2025संहिताएं लागू हुईं, 29 केंद्रीय कानूनों की जगह ली
- फरवरी 2026संसद ने औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया
- 8 मई 2026चारों संहिताओं के तहत केंद्रीय नियम अधिसूचित
- 24 सितंबर 2026श्रम सचिव के मुताबिक दस राज्यों के अंतिम नियम तैयार
- 31 अक्टूबर 2026सभी राज्यों के नियमों के लिए केंद्र का लक्ष्य
मूल दस्तावेज़
- The Industrial Relations Code (Amendment) Bill, 2026PRS Legislative Research