नीतिवित्त
सीतारमण ने विश्व बैंक से कहा, निजी पूंजी का पैमाना जुटाई गई रकम नहीं, रोज़गार हो
बैंकॉक में डेवलपमेंट कमेटी की बैठक में वित्त मंत्री ने विश्व बैंक के गवर्नेंस संकेतकों की पूरी समीक्षा की मांग भी दोहराई, जिन पर भारत लंबे समय से आपत्ति करता रहा है।

मुख्य बातें
- निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को बैंकॉक में डेवलपमेंट कमेटी की 114वीं पूर्ण बैठक में भारत का पक्ष रखा।
- उन्होंने कहा कि निजी निवेश को पैदा हुए रोज़गार और उत्पादकता से आंका जाए, रकम से नहीं।
- भारत ने वर्ल्डवाइड गवर्नेंस इंडिकेटर्स की समीक्षा की अपनी मांग फिर उठाई।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को विश्व बैंक के शीर्ष मंत्रिस्तरीय मंच से कहा कि विकासशील देशों में निजी पूंजी लाने की कोशिशों को इस बात से आंका जाना चाहिए कि उनसे कितने रोज़गार बने। उन्होंने बैंक की गवर्नेंस रैंकिंग में बदलाव की मांग भी फिर से रखी।
सीतारमण विश्व बैंक में भारत की गवर्नर के तौर पर बैंकॉक में डेवलपमेंट कमेटी की 114वीं पूर्ण बैठक में शामिल हुईं। यह बैठक आईएमएफ और विश्व बैंक की सालाना बैठकों के दौरान हुई, जो 18 अक्टूबर तक चलेंगी। बैठक का विषय था “निजी पूंजी जुटाना और रोज़गार”।
उन्होंने कहा, “ऊर्जा बाज़ार पर बढ़ते दबाव, व्यापार के बिखराव, जलवायु से जुड़े दबावों और तेज़ तकनीकी बदलाव के इस दौर में उत्पादक और बेहतर वेतन वाली नौकरियां ही गरीबी घटाने और साझा समृद्धि का सबसे कारगर रास्ता हैं।”
भारत के छह बिंदु
सीतारमण ने छह बिंदु रखे। पहला यह कि रोज़गार के लिए पूरा तंत्र चाहिए। उन्होंने कहा, “रोज़गार के लिए इकोसिस्टम चाहिए, अलग-थलग कदम नहीं।” उन्होंने व्यापक आर्थिक स्थिरता, अच्छे बुनियादी ढांचे, सरल नियमों और वित्त व कौशल तक व्यापक पहुंच को ज़रूरी बताया, और बड़े पैमाने के भौतिक व डिजिटल सार्वजनिक ढांचे तथा वित्तीय समावेशन के भारत के अनुभव का ज़िक्र किया।
उन्होंने कहा कि विकास के एजेंडे के केंद्र में निजी क्षेत्र ही रहना चाहिए और “ज़्यादातर नौकरियां निजी उद्यम ही पैदा करेंगे और उन्हें ही करनी चाहिए”, जिनमें छोटे कारोबार और स्टार्टअप की बड़ी भूमिका होगी। पर पैमाना बदलना होगा। उन्होंने कहा, “सफलता को जुटाई गई रकम से नहीं, नतीजों से मापा जाना चाहिए: कितनी नौकरियां बनीं और उत्पादकता कितनी बढ़ी।”
उन्होंने बैंक की संस्थाओं आईबीआरडी, आईएफसी और मिगा से आपस में तालमेल बढ़ाने और विश्व बैंक समूह के गारंटी प्लेटफ़ॉर्म को जल्द चालू करने को कहा। उनके मुताबिक विकासशील देशों में जोखिम पूंजी की कमी है और निजी निवेशकों को लाने के लिए गारंटी सबसे असरदार साधनों में हैं।
तीसरा बिंदु लागत का था। उन्होंने कहा कि बैंक को स्थानीय मुद्रा में कर्ज़, मज़बूत गारंटी और कम लेनदेन लागत के ज़रिए प्रतिस्पर्धी दरों पर कर्ज़ देना चाहिए, और मध्यम आय वाले देशों के लिए उसकी रणनीति के केंद्र में सस्ता वित्त होना चाहिए।
वह चाहती हैं कि बैंक का शोध और सलाह शहरीकरण, पर्यटन, कृषि निर्यात और अहम खनिजों जैसे क्षेत्रों में बाज़ार की विफलताओं पर केंद्रित हो। उन्होंने कहा कि गरीब देशों में सरकारी क्षमता बढ़ाने में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की भूमिका पर “कहीं ज़्यादा ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है”।
गवर्नेंस रैंकिंग पर आपत्ति
सबसे तीखी बात वर्ल्डवाइड गवर्नेंस इंडिकेटर्स पर थी। ये विश्व बैंक के मिले-जुले अंक हैं, जो बताते हैं कि किसी देश में शासन कैसा है। भारत बरसों से इन पर आपत्ति करता रहा है।
सीतारमण ने कहा, “हम वर्ल्डवाइड गवर्नेंस इंडिकेटर्स और इसी तरह के मिले-जुले आकलनों को लेकर अपनी पुरानी चिंताएं दोहराते हैं।” उन्होंने “मौजूदा पद्धतियों की व्यापक समीक्षा और संशोधन” की मांग की, ताकि वे पारदर्शी, निष्पक्ष और सबूतों पर आधारित हों। उन्होंने कहा कि यह “बैंक के ज्ञान उत्पादों की विश्वसनीयता बचाए रखने” के लिए ज़रूरी है।
आखिर में उन्होंने बैंक के संचालन में विकासशील देशों की आवाज़ मज़बूत करने की मांग की। उन्होंने कहा, “सफलता की असली कसौटी यह है कि सुधार देशों को रोज़गार पैदा करने, उत्पादकता बढ़ाने, गरीबी घटाने और जीवन स्तर सुधारने में मदद करते हैं या नहीं।”
बैंकॉक में सालाना बैठकें सप्ताहांत तक जारी रहेंगी।
मूल दस्तावेज़
- 2026 Annual Meetings, BangkokWorld Bank, 15 अक्टूबर 2026