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सिर्फ धर्म बदलने से कोई पिछड़ा वर्ग मुस्लिम नहीं बन जाता: सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने तमिलनाडु की अपील खारिज कर मद्रास हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसने धर्मांतरण करने वालों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम प्रमाणपत्र देने वाला 2024 का आदेश रद्द किया था।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
सुप्रीम कोर्ट की इमारत
सुप्रीम कोर्ट की इमारतPhoto: Legaleagle86 at English Wikipedia. / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0

मुख्य बातें

  1. सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के जून 2026 के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु की अपील खारिज की।
  2. मार्च 2024 के आदेश से बीसी, एमबीसी, विमुक्त और एससी समूहों से धर्म बदलने वालों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम प्रमाणपत्र मिल सकते थे।
  3. अदालत ने कहा कि धर्मांतरण अपने आप में किसी को अधिसूचित पिछड़े समुदाय का सदस्य नहीं बनाता।

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने गुरुवार को मद्रास हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) के उस फैसले के खिलाफ तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज कर दी, जिसमें इस्लाम अपनाने वालों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदाय प्रमाणपत्र देने वाला 2024 का आदेश रद्द किया गया था।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि धर्मांतरण अपने आप में किसी व्यक्ति को किसी दूसरे अधिसूचित पिछड़े वर्ग समुदाय में गिने जाने का हकदार नहीं बनाता। अदालत ने कहा कि सिर्फ धर्म बदलने से कोई व्यक्ति “राज्य के सात अधिसूचित पिछड़े वर्ग सामाजिक समुदायों में से किसी का सदस्य नहीं बन जाता”।

राज्य का मार्च 2024 का आदेश पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जातियों से धर्म बदलने वालों पर लागू था। इसके तहत वे तमिलनाडु में पिछड़े माने गए सात मुस्लिम समुदायों के तहत प्रमाणपत्र ले सकते थे।

मामला कैसे शुरू हुआ

विवाद समीर अहमद से शुरू हुआ, जिन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया, नाम बदला और इस्लामी रीति से शादी की। उन्होंने मुस्लिम लब्बई समुदाय प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया, जिसे स्थानीय प्रशासन ने खारिज कर दिया। जून 2026 में मद्रास हाईकोर्ट ने सरकारी आदेश को असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया और कहा कि आरक्षण के लिए सिर्फ धर्मांतरण से मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदाय की सदस्यता साबित नहीं होती।

तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाईकोर्ट ने एक वैधानिक आयोग की सिफारिशों पर बनी कार्यपालिका की नीति में गलत दखल दिया। अगस्त में फैसला सुरक्षित रखने वाली पीठ ने यह दलील नहीं मानी।

अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का अपने पुराने धार्मिक और सामाजिक ढांचे में जो सामाजिक पिछड़ापन था, वह अपने आप किसी दूसरे समुदाय की श्रेणी में नहीं ले जाया जा सकता, और कोई निजी धार्मिक संस्था यह अंतिम रूप से तय नहीं कर सकती कि वैधानिक आरक्षण का हकदार कौन है। मामला संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत सरकारी नौकरियों में आरक्षण से जुड़ा था।