नीतिबैंकिंग
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यस बैंक आम निवेशकों को एटी-1 बॉन्ड बेचता रहा और आरबीआई 'मूकदर्शक' बना रहा
यस बैंक मामले के पूरे फैसले में नियामक, बैंक और 2020 के प्रशासक तीनों पर सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने कहा कि ₹8,415 करोड़ के बॉन्ड बट्टे खाते में डालने का आदेश ऐसे व्यक्ति ने दिया जिसके पास यह अधिकार ही नहीं था।

मुख्य बातें
- अदालत ने कहा कि बैंक का कामकाज छिपे तौर पर चलता रहा और आरबीआई "महज मूकदर्शक" बना रहा।
- फैसले में यस बैंक के चेन्नई दफ्तर के दिसंबर 2016 के एक ईमेल का ज़िक्र है, जिसमें आम निवेशकों को एटी-1 बॉन्ड की पेशकश की गई थी।
- पीठ ने कहा कि 14 मार्च 2020 को बॉन्ड राइट-डाउन करने का प्रशासक को अधिकार नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने कहा है कि जब यस बैंक का कामकाज छिपे तौर पर चलाया जा रहा था, तब भारतीय रिज़र्व बैंक “महज मूकदर्शक” बना रहा। इसी फैसले में अदालत ने यह भी पाया कि बैंक ने जोखिम भरे एडिशनल टियर-1 (एटी-1) बॉन्ड आम निवेशकों को थमा दिए।
गुरुवार को सुनाया गया विस्तृत फैसला बताता है कि जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यस बैंक, आरबीआई और केंद्र सरकार की अपीलें क्यों खारिज कीं। पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें बैंक के बचाव के दौरान मार्च 2020 में ₹8,415 करोड़ के एटी-1 बॉन्ड राइट-डाउन करने (बट्टे खाते में डालने) का फैसला रद्द कर दिया गया था।
कठघरे में नियामक
आरबीआई की निगरानी पर पीठ ने तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि नियामक ने बैंक के कॉमन इक्विटी टियर-1 अनुपात, यानी किसी बैंक की पूंजी के मूल पैमाने, को 0.6% तक गिरने दिया, जबकि बैंक का कारोबार छिपे ढंग से चल रहा था। अदालत के मुताबिक आरबीआई, प्रशासक और यस बैंक ने इन बॉन्ड के साथ जो किया, वह “हल्के शब्दों में कहें तो संदिग्ध” था।
अदालत ने यह भी पाया कि आरबीआई के नियम ऐसे उच्च जोखिम वाले साधनों को खुदरा निवेशकों को बेचने पर रोक लगाते थे, फिर भी यस बैंक ने ये बॉन्ड आम लोगों को बेचे। फैसले में 28 दिसंबर 2016 के एक ईमेल का हवाला है, जिसमें बैंक के चेन्नई दफ्तर के एक वरिष्ठ प्रबंधक और वित्तीय सलाहकार ने अलग-अलग ग्राहकों को ये बॉन्ड पेश किए थे। पीठ ने कहा कि ऐसी प्रतिभूतियां आम निवेशकों तक पहुंचाने से पहले कड़ी जांच होनी चाहिए थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि बैंक में गड़बड़ियां पहले ही सामने आ चुकी थीं और उसके कुछ कर्मचारियों पर आपराधिक मामले शुरू हुए थे।
राइट-डाउन क्यों टिक नहीं पाया
कानूनी सवाल इस पर टिका था कि फैसला किसने लिया। आरबीआई के नियुक्त प्रशासक ने 14 मार्च 2020 को बॉन्ड राइट-डाउन किए, यानी यस बैंक पुनर्गठन योजना लागू होने के एक दिन बाद। पीठ ने कहा कि तब तक उनके पास यह अधिकार नहीं बचा था और उन्होंने इस गलतफहमी में कदम उठाया कि अधिकार अब भी उनके पास है।
न्यायाधीशों ने यह भी दर्ज किया कि पुनर्गठन योजना के मसौदे में एटी-1 बॉन्ड को स्थायी रूप से राइट-डाउन करने का प्रावधान था, लेकिन निवेशकों की आपत्ति के बाद केंद्र ने अंतिम योजना से इसे हटा दिया। अदालत ने कहा कि इसके बावजूद राइट-डाउन लागू करने से सरकार पर छिपकर काम करने और जनता के साथ धोखे के आरोप लग सकते हैं, और उसे नहीं लगता कि सरकार का ऐसा कोई इरादा था।
पीठ ने एटी-1 बॉन्ड के राइट-डाउन को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया। उसने कहा कि नियामकीय ढांचे में इसकी अनुमति है, लेकिन सिर्फ सक्षम प्राधिकारी ही तय प्रक्रिया के तहत ऐसा कर सकता है, और बैंक को बचाने के लिए पैसे की ज़रूरत उस प्रक्रिया को लांघने का आधार नहीं हो सकती।
अब आगे क्या
बॉन्डधारकों के लिए कानूनी सवाल अब सुलझ गया है: राइट-डाउन अमान्य है। भुगतान कब और कैसे होगा, यह बैंक को तय करना है। गुरुवार को फैसला आते ही बैंक के शेयर 20% तक टूट गए थे। यस बैंक शनिवार, 17 अक्टूबर को जुलाई-सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेगा और निवेशकों को उम्मीद है कि तब वह बताएगा कि इस देनदारी से कैसे निपटेगा। शुक्रवार सुबह तक न बैंक ने और न आरबीआई ने फैसले पर कोई टिप्पणी की थी।