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मोदी पर टिप्पणी के मानहानि मामले में राहुल गांधी के खिलाफ मुंबई में मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

भाजपा के एक कार्यकर्ता का कहना है कि प्रधानमंत्री को 'कमांडर-इन-थीफ' कहना पार्टी सदस्यों की मानहानि है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सितंबर में मामला रद्द करने से इनकार किया था।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
सुप्रीम कोर्ट की इमारत और कांग्रेस नेता राहुल गांधी (फ़ाइल फ़ोटो)
सुप्रीम कोर्ट की इमारत और कांग्रेस नेता राहुल गांधी (फ़ाइल फ़ोटो)Photos: Pinakpani / Wikimedia Commons; Original: Indian National Congress. / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 and CC BY-SA 3.0

मुख्य बातें

  1. सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में आगे की कार्यवाही पर रोक लगाई और राहुल गांधी की अपील पर नोटिस जारी किया।
  2. शिकायत नरेंद्र मोदी को कथित तौर पर "कमांडर-इन-थीफ" और "चोरों के सरदार" कहने को लेकर है।
  3. बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8 सितंबर को कहा था कि भाजपा एक पहचान योग्य समूह है जिसकी मानहानि हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने मंगलवार को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कथित टिप्पणी को लेकर चल रहे आपराधिक मानहानि मुकदमे पर रोक लगा दी और उनकी अपील पर महाराष्ट्र सरकार और शिकायतकर्ता से जवाब मांगा।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ राहुल गांधी की चुनौती पर चार हफ्ते में जवाब के लिए नोटिस जारी किया, जिसमें मामला रद्द करने से इनकार किया गया था। पीठ ने आदेश दिया, “इस बीच, निचली अदालत में आगे की कार्यवाही पर रोक रहेगी।” वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी राहुल गांधी की ओर से पेश हुए।

शिकायत

मामला महेश श्रीश्रीमाल ने दायर किया है, जो कहते हैं कि वे दो दशक से भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। उन्हें 2018 में राजस्थान की एक रैली में राहुल गांधी के मोदी को कथित तौर पर “चोरों के सरदार” और “कमांडर-इन-थीफ” कहने पर आपत्ति है। उनकी दलील है कि इन टिप्पणियों ने भाजपा के हर सदस्य को चोर बताया और पार्टी की साख गिराई।

मुंबई के गिरगांव की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने अगस्त 2019 में राहुल गांधी को समन जारी किया था। वे हाईकोर्ट गए और दलील दी कि उन्होंने भाजपा या किसी पार्टी का नाम नहीं लिया, कोई पहचान योग्य समूह निशाने पर नहीं था, इसलिए शिकायतकर्ता को मुकदमा करने का अधिकार नहीं है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा था

8 सितंबर को हाईकोर्ट इससे सहमत नहीं हुआ। उसने कहा कि पंजीकृत राष्ट्रीय पार्टी के रूप में भाजपा एक पहचान योग्य समूह है, और इस चरण पर टिप्पणी को सिर्फ पार्टी के शीर्ष नेताओं तक सीमित नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि इससे आम सदस्यों को ठेस पहुंची या नहीं, यह मुकदमे में देखा जाएगा। महाराष्ट्र के महाधिवक्ता ने दलील दी थी कि मामले को शुरुआत में ही खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

अब यह अपील एक ऐसा सवाल उठाती है जिसका असर इस मामले से कहीं आगे तक है: क्या कोई पार्टी कार्यकर्ता तब भी आपराधिक मानहानि की शिकायत कर सकता है जब आपत्तिजनक शब्दों में न पार्टी का नाम हो, न उसके सदस्यों का।

जब तक सुप्रीम कोर्ट अपील पर सुनवाई नहीं करता, मुंबई का मुकदमा रुका रहेगा।