समझिएअंतरिक्ष
नाविक क्या है, और भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली के लिए एनवीएस-03 का प्रक्षेपण क्यों ज़रूरी है
इसरो 30 अक्टूबर को श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी पर एनवीएस-03 उपग्रह भेजेगा। नाविक क्या है, खराब घड़ियों और एक खोए उपग्रह ने इसे पूरी सेवा से कैसे दूर रखा, और एक प्रक्षेपण क्या ठीक कर सकता है।
संक्षेप में
नाविक भारत की क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है, जिसे इसरो चलाता है। यह जीपीएस पर निर्भर हुए बिना भारत और उसकी सीमाओं से करीब 1,500 किमी आगे तक स्थिति और समय बताती है। पहली पीढ़ी के उपग्रहों की परमाणु घड़ियों के खराब होने और 2025 में एनवीएस-02 के खो जाने से इसके पास तीन काम करते उपग्रह बचे, जबकि अपने दम पर लोकेशन बताने के लिए चार चाहिए। 30 अक्टूबर को भारत में बनी रूबिडियम घड़ी के साथ जाने वाला एनवीएस-03 इसे फिर उस न्यूनतम स्तर तक पहुंचा देगा।
नाविक क्या है?
यह भारत की अपनी उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बनाया है और वही चलाता है।
इसका औपचारिक नाम इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) है; आम लोगों के बीच यह नाविक (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) कहलाता है। अमेरिका के जीपीएस की तरह इसके उपग्रह भी बहुत सटीक समय के सिग्नल भेजते हैं। ज़मीन पर रिसीवर कई उपग्रहों के सिग्नल मिलाकर हिसाब लगाता है कि वह कहां है।
फर्क पहुंच का है। जीपीएस पूरी दुनिया को कवर करता है। नाविक क्षेत्रीय है: इसका मुख्य सेवा क्षेत्र भारत और उसकी सीमाओं के आसपास करीब 1,500 किमी है, जिसमें हिंद महासागर का बड़ा हिस्सा आता है। इसके उपग्रह भूस्थिर और झुकी हुई भू-समकालिक कक्षाओं में इस क्षेत्र के ऊपर ऊंचाई पर रहते हैं, इसलिए आसमान के एक ही हिस्से में बने रहते हैं।
भारत को अपनी प्रणाली क्यों चाहिए?
ताकि देश के ऊपर लोकेशन और समय किसी दूसरी सरकार के नियंत्रण वाली प्रणाली पर निर्भर न रहें।
नेविगेशन सिग्नल विमानों, जहाज़ों, ट्रकों और मिसाइलों को रास्ता दिखाते हैं, और बिजली ग्रिड, दूरसंचार नेटवर्क और बैंकों का तालमेल बनाए रखते हैं। जो देश पूरी तरह जीपीएस पर टिका है, वह इस भरोसे पर टिका है कि अमेरिका उसे चालू और सटीक रखेगा। नाविक भारत को अपना सिग्नल देने के लिए बनाया गया, जिसमें नागरिकों के लिए खुली सेवा और सेनाओं के लिए एक सीमित, एन्क्रिप्टेड सेवा है।
सामान्य सेवा का लक्ष्य भारत के ऊपर करीब 5 से 10 मीटर तक सही लोकेशन बताना है। नाविक दो फ्रीक्वेंसी बैंड, एल5 और एस, इस्तेमाल करता है, जिससे रिसीवर ऊपरी वायुमंडल से होने वाली गड़बड़ी का अनुमान लगाने के बजाय उसे सीधे माप सकते हैं।
गड़बड़ी कहां हुई?
पहले घड़ियां खराब हुईं, फिर एक बदले में भेजा गया उपग्रह खो गया।
हर नेविगेशन उपग्रह में परमाणु घड़ियां होती हैं, और बिना चालू घड़ी के उपग्रह अपना मुख्य काम नहीं कर सकता। नाविक का पहला उपग्रह आईआरएनएसएस-1ए 1 जुलाई 2013 को तीन आयातित रूबिडियम घड़ियों के साथ भेजा गया था। पहली घड़ी जुलाई 2016 में बंद हुई और बाकी दो कुछ समय बाद। मई 2018 तक पूरी प्रणाली में कक्षा में मौजूद 24 में से नौ घड़ियां खराब हो चुकी थीं।
उपग्रह बदलना भी मुश्किल रहा। अगस्त 2017 में 1ए की जगह भेजा गया आईआरएनएसएस-1एच तब खो गया जब उसके पीएसएलवी रॉकेट की हीट शील्ड अलग नहीं हुई। आईआरएनएसएस-1आई अप्रैल 2018 में कक्षा में पहुंचा। फिर जनवरी 2025 में भेजा गया एनवीएस-02 अपनी तय कक्षा तक नहीं पहुंच पाया, क्योंकि प्रणोदन में खराबी से उसे ऊपर ले जाने वाला अभियान रुक गया।
नाविक को कितने उपग्रह चाहिए?
अपने दम पर लोकेशन देने के लिए कम से कम चार काम करते उपग्रह।
तीन आयामों में अपनी जगह तय करने और अपनी घड़ी सुधारने के लिए रिसीवर को चार उपग्रहों के सिग्नल चाहिए। नाविक के पास इस सेवा के लिए अभी सिर्फ तीन उपलब्ध हैं। तीन के साथ यह स्वतंत्र लोकेशन सेवा नहीं दे सकता, और 2024 के आखिर तक इसका इस्तेमाल ज़्यादातर सेनाओं तक सीमित था।
नाविक उपग्रहों की दो पीढ़ियां
एनवीएस-03 में नया क्या है?
इसमें भारतीय परमाणु घड़ी है और आम उपभोक्ता उपकरणों के लिए बना सिग्नल भी।
एनवीएस-03 दूसरी पीढ़ी के एनवीएस उपग्रहों में तीसरा और इस प्रणाली के लिए बना बारहवां अंतरिक्ष यान है। इसका वज़न 2,232 किलो है और इसे 32.5 डिग्री पूर्व की जगह से 12 साल काम करने के लिए बनाया गया है। इसकी रूबिडियम घड़ी इसरो के अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लिकेशंस सेंटर ने विकसित की है, जो आयातित घड़ियों की खराबी का सीधा जवाब है।
यह एल1 बैंड पर भी सिग्नल भेजता है, वही फ्रीक्वेंसी जिस पर जीपीएस अपना मुख्य नागरिक सिग्नल देता है। फोन, स्मार्टवॉच और फिटनेस ट्रैकर एल1 के हिसाब से बने होते हैं और नाविक के पुराने एल5 और एस सिग्नल उनके लिए मुश्किल रहे हैं। 29 मई 2023 को भेजे गए पहले एनवीएस उपग्रह, एनवीएस-01, से ही भारतीय घड़ी और एल1 सिग्नल की शुरुआत हुई थी।
क्या मेरा फोन नाविक इस्तेमाल करता है?
हो सकता है, अगर उसकी चिप इसे सपोर्ट करती हो। कुछ फोन 2020 से क्वालकॉम चिपसेट के ज़रिए नाविक सिग्नल पकड़ पा रहे हैं, और तब से एल1 सिग्नल का सपोर्ट भी आ रहा है। फोन में इसे अनिवार्य करने का कोई नियम नहीं है। व्यावसायिक वाहनों की बात अलग है: 1 अप्रैल 2019 से उन्हें एआईएस 140 मानक के तहत नाविक आधारित ट्रैकिंग उपकरण लगाने होते हैं।
ज़्यादातर फोन एक साथ कई प्रणालियों के सिग्नल मिलाते हैं, इसलिए मज़बूत नाविक जीपीएस की जगह नहीं लेता, बल्कि सटीकता बढ़ाता है और एक बैकअप देता है।
प्रक्षेपण के बाद क्या?
अगर एनवीएस-03 अपनी जगह पहुंच गया, तो नाविक फिर अपनी न्यूनतम ज़रूरत पर आ जाएगा।
श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से जीएसएलवी एमके II पर यह प्रक्षेपण पहले अक्टूबर के मध्य में और उससे पहले 2025 के आखिर में होना था; इस साल पीएसएलवी को लगे झटकों के बाद इसरो अपने कार्यक्रम को लेकर सावधानी बरत रहा है। सफल उड़ान भी सिर्फ न्यूनतम स्तर बहाल करेगी। एनवीएस-04 और एनवीएस-05 बन रहे हैं, और इसरो की लंबी योजना उपग्रहों की संख्या बढ़ाने की है ताकि एक उपग्रह खोने से पूरी सेवा खतरे में न पड़े।