समझिएअरुणाचल प्रदेश
सियांग बांध क्या है: 11,000 मेगावाट की परियोजना और आदि समुदाय के विरोध की वजह
सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट के खिलाफ बंद के बाद पासीघाट में रात भर तोड़फोड़ हुई, और पेमा खांडू ने बातचीत की पेशकश की है। यह बांध किस लिए है, ऊपर चीन का विशाल बांध इसमें कहां आता है, और नदी किनारे बसे लोग इसे क्यों नकार रहे हैं।
संक्षेप में
सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (एसयूएमपी) अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर प्रस्तावित लगभग 11,000 मेगावाट का भंडारण बांध है। सियांग ब्रह्मपुत्र का वह हिस्सा है जो तिब्बत से भारत में आता है। केंद्र और राज्य सरकार का कहना है कि लगभग 9 अरब घन मीटर का इसका जलाशय चीन की ओर से अचानक पानी छोड़ने या रोकने से भारत को बचाएगा। चीन ने 2025 में ऊपर की ओर इससे कहीं बड़ा बांध बनाना शुरू किया था। जिन आदि गांवों और खेतों के डूबने का खतरा है, वे कहते हैं कि उनसे कभी सहमति नहीं ली गई। प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट के लिए एनएचपीसी का सर्वे अभी जारी है।
सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट क्या है?
यह सियांग नदी पर प्रस्तावित एक विशाल बांध और जलाशय है, वही नदी जो आगे चलकर ब्रह्मपुत्र बनती है।
यारलुंग त्सांगपो तिब्बत से निकलती है, हिमालय को काटती हुई अरुणाचल प्रदेश में सियांग के नाम से प्रवेश करती है। पासीघाट के नीचे असम में दूसरी नदियों से मिलकर यह ब्रह्मपुत्र कहलाती है। सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट, यानी एसयूएमपी, के तहत अपर सियांग जिले में गेकू गांव के पास इस नदी पर बांध बनाया जाना है, जिसकी स्थापित क्षमता लगभग 11,000 मेगावाट होगी।
यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना होगी, और वह भी काफी अंतर से। यह विचार पहली बार 2017 में नीति आयोग ने रखा था, और अप्रैल 2022 में केंद्र ने सरकारी जलविद्युत कंपनी एनएचपीसी से प्री-फिजिबिलिटी सर्वे करने को कहा। मुख्यमंत्री पेमा खांडू कह चुके हैं कि जलाशय में लगभग 9 अरब घन मीटर पानी रहेगा, और अनुमानों में इसकी लागत लगभग ₹1.13 लाख करोड़ बताई गई है।
इसे “मल्टीपर्पज” क्यों कहा जाता है?
क्योंकि सरकार के मुताबिक यह सिर्फ बिजली का नहीं, जल सुरक्षा का मामला है।
खांडू ने कहा है, “एसयूएमपी सिर्फ बिजली बनाने के लिए नहीं है।” उनका तर्क है कि इसका असली मकसद “सियांग नदी और उन समुदायों को बचाना है जो पीढ़ियों से इस पर निर्भर रहे हैं”, यानी सूखे मौसम में नदी का बहाव बनाए रखना और बाढ़ को थामना।
वजह ऊपर की ओर है। जुलाई 2025 में चीन ने अरुणाचल की सीमा से करीब 30 किलोमीटर उत्तर में निचली यारलुंग त्सांगपो पर लगभग 60 गीगावाट की जलविद्युत परियोजना का निर्माण शुरू किया, जो दुनिया में अपनी तरह की सबसे बड़ी परियोजना है। भारतीय मंत्री इसे संभावित “वॉटर बम” कह चुके हैं: सिद्धांत रूप में चीन पानी रोक सकता है या अचानक छोड़ सकता है। नीचे की ओर बड़ा भारतीय जलाशय दोनों स्थितियों में बफर का काम करेगा, ऐसा माना जा रहा है। खांडू ने दिसंबर 2024 में कहा था, “चीन का कोई भरोसा नहीं, वह कुछ भी कर सकता है।”
भारत और चीन के बीच इस नदी के पानी के बंटवारे पर कोई संधि नहीं है। जिस समझौते के तहत चीन बाढ़ के मौसम में ब्रह्मपुत्र का डेटा साझा करता था, वह जून 2023 में खत्म हो गया और उसका नवीनीकरण नहीं हुआ।
किसकी ज़मीन जाएगी?
सियांग किनारे बसे आदि गांवों की, और उन खेतों की जिन पर वे जीते हैं।
परियोजना क्षेत्र में अरुणाचल के सबसे बड़े मूल निवासी समुदायों में से एक, आदि समुदाय, रहता है, जो नदी किनारे की सीढ़ीदार ज़मीन पर धान, अदरक और इलायची उगाता है। कितने गांव डूबेंगे, इस पर अनुमान अलग अलग हैं। एक आकलन के अनुसार 13 गांव पूरी तरह डूब जाएंगे; सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम के अध्यक्ष गेगोंग जिजोंग का कहना है कि सियांग और अपर सियांग जिलों के कम से कम 27 गांव सीधे प्रभावित होंगे।
ग्रामीणों को यह डर भी है कि बांध वह गाद रोक लेगा जो नदी नीचे के खेतों तक लाती है।
लोग विरोध क्यों कर रहे हैं?
उनका कहना है कि परियोजना उनकी सहमति के बिना उन पर थोपी जा रही है।
सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम जैसे संगठन 2024 से विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सर्वे का काम “समुदायों की पूर्व और सूचित सहमति” लिए बिना शुरू हुआ। प्रशासन ने जवाब में सशस्त्र बल और पुलिस तैनात की, जिससे नाराज़गी और बढ़ी। फोरम के सदस्य ताबेंग सिराम ने कहा है, “अगर बांध बना, तो हम सब कुछ खो देंगे।”
23 अक्टूबर 2026 को एसयूएमपी विरोधी संगठनों ने सियांग, अपर सियांग और ईस्ट सियांग जिलों में 12 घंटे का बंद बुलाया। दिन में बंद काफी हद तक शांतिपूर्ण रहा, लेकिन रात में पासीघाट में एक थाने, एनएचपीसी के दफ्तर और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष कालिंग मोयोंग तथा विधायकों ओनी पन्यांग और निनोंग एरिंग के घरों में तोड़फोड़ हुई।
क्या विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कारगर होगा?
सभी नहीं। कुछ पर्यावरण शोधकर्ता बताते हैं कि जलविद्युत बांध को बिजली बनाने के लिए आमतौर पर जितना हो सके भरा रखा जाता है, जिससे अचानक आई बाढ़ को सोखने की गुंजाइश कम रह जाती है। संकरी और गहरी घाटी भी जलाशय की बफर क्षमता को सीमित करती है। दूसरी ओर कुछ जानकार कहते हैं कि चीन जितना आगे निकल चुका है, उसे देखते हुए नदी के पानी पर अपना दावा मज़बूत करने के लिए भारत को बांध बनाना ही होगा।
आगे क्या?
बातचीत, अगर दोनों पक्ष आएं। खांडू ने शनिवार को कहा कि सरकार के “दरवाज़े हमेशा खुले हैं” और बांध विरोधियों से ईटानगर, पासीघाट या उनकी पसंद की किसी भी जगह मिलने की पेशकश की। उन्होंने कहा कि प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट की प्रक्रिया पूरी होने तक वह यह महीना सियांग क्षेत्र में बिताएंगे।
यह रिपोर्ट सिर्फ पहला कदम है। निर्माण शुरू होने से पहले विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, पर्यावरण और वन मंज़ूरी तथा जन सुनवाई होनी है, और हर चरण में वह सहमति चाहिए होगी जो आदि समुदाय के मुताबिक उनसे कभी मांगी ही नहीं गई।