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गगनयान जी1: व्योममित्र के साथ भारत की पहली मानवरहित उड़ान को क्या साबित करना है
इसरो प्रमुख वी नारायणन का कहना है कि गगनयान की पहली परीक्षण उड़ान करीब दो महीने दूर है। अंतरिक्ष यात्रियों से पहले रोबोट क्यों जा रहा है, कैप्सूल को क्या झेलना है, और भारतीयों के उड़ान भरने से पहले कितने कदम बाकी हैं।
संक्षेप में
जी1 गगनयान क्रू कैप्सूल की पहली कक्षीय उड़ान है। इसमें कोई अंतरिक्ष यात्री नहीं, बल्कि अर्ध-मानवाकार रोबोट व्योममित्र और एक छोटा जैविक प्रयोग होगा। श्रीहरिकोटा से मानव-रेटेड एचएलवीएम3 रॉकेट पर लॉन्च होकर इसे दिखाना है कि कैप्सूल पृथ्वी की निचली कक्षा तक पहुंच सकता है, केबिन की प्रणालियां काम करती रहती हैं, वह वायुमंडल से सुरक्षित लौटता है, पैराशूट सही क्रम में खुलते हैं और समुद्र में उतरकर उसे निकाला जा सकता है। इसरो अध्यक्ष वी नारायणन ने 24 अक्टूबर को कहा कि यह करीब दो महीने में उड़ेगा। पहली मानवयुक्त उड़ान से पहले और मानवरहित परीक्षण होने हैं; मानवयुक्त उड़ान का लक्ष्य 2027 है।
जी1 क्या है?
यह पहली बार होगा जब गगनयान क्रू कैप्सूल कक्षा में जाएगा, और अंदर दल की जगह एक रोबोट होगा।
गगनयान इसरो का वह कार्यक्रम है जिसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्री भारतीय रॉकेट से अंतरिक्ष जाएंगे। किसी के सवार होने से पहले एजेंसी पूरी प्रणाली, यानी रॉकेट, कैप्सूल और रिकवरी, को बिना इंसान के उड़ाकर काम करते देखना चाहती है। जी1 वही पूर्वाभ्यास है।
इसरो अध्यक्ष वी नारायणन ने शनिवार को चेन्नई में कहा, “जी1 उड़ान एक मानवरहित परीक्षण मिशन है जो अर्ध-मानवाकार रोबोट व्योममित्र को पृथ्वी की निचली कक्षा में ले जाएगा।” उन्होंने बताया कि यह करीब दो महीने में होगी। यह श्रीहरिकोटा से एचएलवीएम3 पर उड़ान भरेगी, जो इसरो के सबसे भारी रॉकेट एलवीएम3 का मानव-रेटेड संस्करण है।
रोबोट क्यों भेजा जा रहा है?
केबिन को अंदर से उसी तरह परखने के लिए जैसे कोई अंतरिक्ष यात्री उसे महसूस करेगा।
व्योममित्र का सिर, हाथ और धड़ है, पैर नहीं। नारायणन कह चुके हैं कि यह मॉड्यूल के मापदंडों पर नज़र रखेगा, चेतावनी देगा और जीवन रक्षक प्रणाली से जुड़े काम करेगा। इसके सेंसर लॉन्च के कंपन से लेकर वापसी की गर्मी और तेज़ी से घटती रफ्तार तक, केबिन पर गुज़रने वाली हर चीज़ दर्ज करेंगे, ताकि इंजीनियर आंक सकें कि इंसानी दल सुरक्षित रहेगा या नहीं।
बताया गया है कि उड़ान में फल मक्खियों के साथ एक छोटा जैविक प्रयोग भी होगा, जिसे टीआईएफआर, धारवाड़ के कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय और आईआईएसटी के शोधकर्ताओं ने तैयार किया है, ताकि पता चले कि अंतरिक्ष उड़ान का जीवों पर क्या असर होता है।
उड़ान को क्या साबित करना है?
कि लॉन्च से लेकर समुद्र में उतरने तक हर कदम सही क्रम में काम करता है।
एचएलवीएम3 को कैप्सूल और उसके सर्विस मॉड्यूल को लगभग 170 गुणा 408 किलोमीटर की नियोजित निचली कक्षा में पहुंचाना है। कक्षा में क्रू मॉड्यूल के अपने थ्रस्टर, 100 न्यूटन के 12 थ्रस्टर, उसकी दिशा संभालेंगे। लौटने से पहले क्रू मॉड्यूल सर्विस मॉड्यूल से अलग होगा। इसरो ने इसी महीने विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में ज़मीन पर इसका अभ्यास किया और कहा कि अलगाव के झटके में कैप्सूल की एवियोनिक्स और हीट शील्ड सही सलामत रहीं।
फिर सबसे कठिन हिस्सा आता है। कैप्सूल को वायुमंडल में वापसी झेलनी है और 10 पैराशूट की एक कड़ी से धीमा होना है: दो पैराशूट सुरक्षा कवच हटाने के लिए, दो ड्रोग पैराशूट उसे स्थिर करने और रफ्तार घटाने के लिए, तीन पायलट पैराशूट और आखिर में तीन मुख्य पैराशूट। इसके बाद उसे समुद्र में उतरना है और वहां से निकाला जाना है। प्रशांत और उत्तरी अटलांटिक महासागर में तैनात किराये के जहाज़ उड़ान पर नज़र रखने में मदद करेंगे।
जी1 तक का सफर
- अक्टूबर 2023टीवी-डी1 में श्रीहरिकोटा के पास एक-चरणीय रॉकेट पर क्रू एस्केप सिस्टम का परीक्षण।
- अप्रैल 2026पैराशूट जांचने के लिए वायुसेना के चिनूक से बंगाल की खाड़ी के ऊपर क्रू मॉड्यूल गिराया गया।
- अक्टूबर 2026वीएसएससी में क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल अलगाव परीक्षण पूरे।
- करीब दिसंबर 2026नारायणन के 24 अक्टूबर के बयान के करीब दो महीने बाद, व्योममित्र के साथ एचएलवीएम3 पर जी1 की उड़ान।
- 2027भारत की पहली मानवयुक्त गगनयान उड़ान का लक्ष्य।
इतना समय क्यों लगा?
क्योंकि रॉकेट और कैप्सूल को इंसानों के लिए सुरक्षित बनाने में शॉर्टकट की गुंजाइश बहुत कम होती है।
पहली मानवरहित उड़ान का लक्ष्य शुरू में दिसंबर 2020 था। महामारी ने इसे टाला, और फिर हर रॉकेट चरण, पैराशूट और एस्केप सिस्टम को सामान्य उपग्रह लॉन्च से कहीं कड़े मानक पर खरा उतारना पड़ा। तब से तारीख कई बार खिसकी है, हाल में 2025 से 2026 के आखिरी हिस्से तक।
जी1 के बाद क्या?
और मानवरहित उड़ानें, फिर अंतरिक्ष यात्री। दल के उड़ने से पहले जी1 कई मानवरहित मिशनों में पहला है, और व्योममित्र के दोबारा उड़ने की उम्मीद है। अगर ये ठीक रहे, तो पहली मानवयुक्त उड़ान का इसरो का लक्ष्य 2027 है, जिसमें भारतीय वायुसेना के वे टेस्ट पायलट होंगे जो अंतरिक्ष यात्री के रूप में प्रशिक्षण ले रहे हैं। सफल जी1 इस लक्ष्य के व्यावहारिक होने का अब तक का सबसे साफ संकेत होगा; कोई गड़बड़ी इसे लगभग निश्चित रूप से आगे खिसका देगी।