समझिएयूरोप
फ्रांस की सड़कों पर गुस्सा क्यों: एक स्कूल का विरोध देशव्यापी आंदोलन कैसे बना
शुरुआत पेरिस के एक उपनगर के ऐसे स्कूल से हुई जहां शिक्षक नहीं थे। पांच हफ्ते बाद हर शनिवार लाखों लोग सड़कों पर हैं, हज़ारों गिरफ्तार हो चुके हैं और 2027 के राष्ट्रपति चुनाव में एक नई दरार उभर आई है। प्रदर्शनकारी क्या चाहते हैं और आगे क्या होगा।
संक्षेप में
फ्रांस में विरोध प्रदर्शन 21 सितंबर 2026 को पेरिस के पास क्रेतेई के एक हाई स्कूल की नाकेबंदी से शुरू हुए, जहां खाली पड़े शिक्षक पद, भरी हुई कक्षाएं और जर्जर इमारत मुद्दा थे। यह आंदोलन देशभर के स्कूलों में फैला और फिर ईंधन की किल्लत, महंगाई और सरकारी कर्मचारियों का वेतन रोकने वाले 2027 के बजट पर गुस्से से जुड़ गया, जिससे यूनियनें और 'येलो वेस्ट' आंदोलन के पुराने कार्यकर्ता भी शामिल हो गए। अक्टूबर के दो शनिवारों के विशाल मार्च में लूटपाट हुई, कर्फ्यू लगा और हज़ारों गिरफ्तारियां हुईं। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने और शिक्षकों तथा पार्कूर्सुप विश्वविद्यालय दाखिला प्रणाली में बदलाव का वादा किया है, लेकिन छात्रों ने शनिवार को फिर मार्च का आह्वान किया है।
शुरुआत कैसे हुई?
21 सितंबर को पेरिस के एक उपनगर में एक स्कूल की नाकेबंदी से।
पेरिस के दक्षिण-पूर्व में क्रेतेई के लीसे सेंट-एक्सुपेरी के छात्रों ने अपने स्कूल को घेर लिया। मुद्दे थे: जिन शिक्षकों की जगह कोई नहीं आया, ज़रूरत से ज़्यादा भरी कक्षाएं और टूटती इमारत। नाकेबंदी के वीडियो सोशल मीडिया पर फैले, दूसरे स्कूलों ने अपनी शिकायतें जोड़ीं और कुछ ही दिनों में पेरिस क्षेत्र के कई स्कूल बंद हो गए।
हाई स्कूल छात्रों की यूनियन यूएसएल के अध्यक्ष रियाद रानी ने कहा, “हमने पेरिस क्षेत्र में जो हो रहा है उसे आगे बढ़ाने का फैसला किया क्योंकि ये समस्याएं पूरे देश में हैं।” 6 अक्टूबर को करीब 4.5 लाख छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने पूरे फ्रांस में मार्च किया, इनमें से करीब एक लाख पेरिस में थे।
छात्र किस बात से नाराज़ हैं?
शिक्षकों की कमी, भरी हुई कक्षाएं, जर्जर इमारतें और एक ऐसी दाखिला प्रणाली जिसे वे अपारदर्शी मानते हैं।
2024-25 के स्कूली साल में फ्रांस के सरकारी हाई स्कूलों में तय कक्षाओं के लगभग दसवें हिस्से में पढ़ाई ही नहीं हुई। 35 से ज़्यादा छात्रों की कक्षाएं आम हैं, स्कूल का दिन सुबह 8 बजे से देर दोपहर तक चल सकता है, और इस साल की लू ने टूटी-फूटी, बिना हवा वाली कक्षाओं की हालत उजागर कर दी।
इन व्यावहारिक शिकायतों के पीछे एक बड़ा आरोप है कि फ्रांस की स्कूली व्यवस्था बच्चों को उनकी पृष्ठभूमि के हिसाब से छांटती है। 15 साल की उम्र में अंकों के आधार पर छात्रों को सामान्य या व्यावसायिक धारा में भेजा जाता है, और गरीब घरों के बच्चे बड़ी संख्या में व्यावसायिक स्कूलों में पहुंचते हैं। देश के राजनीतिक और कारोबारी वर्ग को तैयार करने वाले प्रतिष्ठित ‘ग्रांद ज़ेकोल’ तक का रास्ता ज़्यादातर पेशेवर परिवारों के बच्चों के हाथ में है।
पार्कूर्सुप क्या है?
वह राष्ट्रीय ऑनलाइन मंच जिसके ज़रिए 2018 से हर छात्र विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए आवेदन करता है।
छात्र अपनी पसंद के कोर्स चुनते हैं और विश्वविद्यालय उनके रिकॉर्ड के आधार पर उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करते हैं। प्रदर्शनकारी इसे अपारदर्शी और तनाव भरा बताते हैं, और इसमें बदलाव उनकी मुख्य मांगों में शामिल है। 18 साल की प्रदर्शनकारी सलामा गरगौरी ने शिकायतों की सूची यूं गिनाई: “भारी-भरकम समय सारिणी, व्यवस्था, शिक्षक, वे लोग जो हमारी नहीं सुनते, विश्वविद्यालय की आवेदन प्रक्रिया।”
स्कूल का विरोध महंगाई का आंदोलन कैसे बन गया?
क्योंकि यह ठीक उस समय आया जब ईंधन, खाने और ऊर्जा की कीमतें चुभ रही थीं और सरकार तंग बजट की तैयारी कर रही थी।
फ्रांस में डीज़ल की किल्लत रही है; पिछले हफ्ते खाड़ी के दौरे पर मैक्रों ने यूएई, बहरीन और सऊदी अरब से हर महीने आपूर्ति का इंतज़ाम किया। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू का 2027 का बजट सरकारी कर्मचारियों का वेतन रोकेगा और पेंशन बढ़ोतरी सीमित करेगा, क्योंकि फ्रांस जीडीपी के 5.1% के घाटे को कम करना चाहता है।
सरकार ने विश्वविद्यालयों की कुछ फीस बढ़ाने की योजना छोड़ दी और 3,000 अस्थायी शिक्षक देने की पेशकश की। यूनियनों ने इसे नाकाफी बताकर ठुकरा दिया और 13 अक्टूबर को राष्ट्रीय विरोध दिवस बुलाया। 17 अक्टूबर को सीजीटी यूनियन और 2018 के ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन के कार्यकर्ता छात्रों के साथ आ गए। गृह मंत्रालय ने 5.5 लाख प्रदर्शनकारी गिने; आयोजकों ने 8 लाख कहे।
फ्रांस में विरोध के पांच हफ्ते
- 21 सितंबर 2026शिक्षकों की कमी और जर्जर इमारत पर क्रेतेई के लीसे सेंट-एक्सुपेरी की नाकेबंदी।
- 6 अक्टूबरकरीब 4.5 लाख छात्र, अभिभावक और शिक्षक पूरे फ्रांस में मार्च करते हैं।
- 13 अक्टूबर3,000 अस्थायी शिक्षकों की पेशकश ठुकराकर यूनियनों का राष्ट्रीय विरोध दिवस।
- 17 अक्टूबरयूनियनें और येलो वेस्ट शामिल; 5.5 लाख का मार्च, लिमोज़ सिटी हॉल में आग, 2,300 से ज़्यादा गिरफ्तार।
- 19 अक्टूबरपेरिस, बोर्दो, नीस और दूसरे शहरों में कर्फ्यू।
- 24 अक्टूबरदूसरा बड़ा शनिवार: 70,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती के बीच 4.1 लाख का मार्च, करीब 1,000 गिरफ्तार।
- 31 अक्टूबरछात्रों ने अगले राष्ट्रीय मार्च का आह्वान किया है।
हिंसा कितनी हुई है?
पहले बड़े शनिवार को फ्रांस ने बरसों का सबसे बुरा दंगा देखा; दूसरा शांत रहा, लेकिन तनाव बना रहा।
17 अक्टूबर को लिमोज़ के सिटी हॉल में आग लगा दी गई, प्रदर्शनकारी ज़बरदस्ती मार्सेय के सिटी हॉल में घुस गए, और पेरिस, ल्यों व दूसरी जगहों पर दुकानें लूटी गईं। उस दिन 2,300 से ज़्यादा लोग गिरफ्तार हुए और करीब 1,000 पुलिसकर्मी और जेंडार्म घायल हुए। प्रदर्शनकारी भी घायल हुए, जिनमें सेंट-एटिएन का एक युवक है जिसका हाथ चला गया। कारोबारी संगठन मेडेफ के मुताबिक कम से कम 3,000 कारोबार प्रभावित हुए।
पिछले शनिवार सरकार ने 70,000 पुलिसकर्मी सड़कों पर उतारे, लूव्र बंद किया और कई शहरों में मार्च पर रोक लगाई। करीब 4.1 लाख लोग निकले, लगभग 1,000 गिरफ्तार हुए और अंधेरा होने के बाद पेरिस, मार्सेय, ल्यों और दूसरे शहरों में पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी। गृह मंत्री लॉरां नुनेज़ ने इसे पिछले हफ्ते से बेहतर बताया।
सरकार ने क्या किया है?
पहले व्यवस्था बहाल करने का वादा, फिर गलतियों की स्वीकारोक्ति, और अब रियायतें।
पहले दंगों के बाद मैक्रों ने अपने “गुस्से और शर्म” की बात कही, और बाद में “पूर्वानुमान और खुफिया तंत्र की विफलताएं” मानीं। उन्होंने नुनेज़ का इस्तीफा ठुकरा दिया, चुनिंदा इलाकों में कर्फ्यू लगाया और धुर-वामपंथी गुटों की हरकतों को “राजद्रोह” कहा। शुक्रवार को उन्होंने छात्र प्रतिनिधियों से मुलाकात कर और शिक्षकों तथा पार्कूर्सुप में बदलाव का वादा किया। छात्र संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने शनिवार 31 अक्टूबर को फिर मार्च का आह्वान किया है।
फ्रांस के बाहर इसका महत्व क्यों है?
क्योंकि फ्रांस अगले वसंत में नया राष्ट्रपति चुनेगा, और ये प्रदर्शन चुनाव प्रचार की पहली बड़ी परीक्षा बन गए हैं।
मैक्रों फिर चुनाव नहीं लड़ सकते। फ्रांस अनबोड के ज़्यां-ल्यूक मेलांशों छात्रों के साथ मार्च कर चुके हैं और कहते हैं कि सरकार के झुकने तक हर हफ्ते प्रदर्शन होंगे। सर्वेक्षणों में आगे चल रही मरीन ल पेन और जॉर्डन बार्देला की नेशनल रैली सरकार पर व्यवस्था न संभाल पाने का आरोप लगाती है। इटली और बेल्जियम में भी महंगाई के खिलाफ ऐसे प्रदर्शन हिंसक हुए हैं, और भारत के विदेश मंत्रालय ने फ्रांस, इटली और बेल्जियम में रह रहे अपने नागरिकों को प्रदर्शनों से दूर रहने की सलाह दी है।