समझिएभारत और पाकिस्तान
सिंधु जल संधि क्या है: भारत के 'स्थगन' का मतलब, और पाकिस्तान इसे 'रेड लाइन' क्यों कहता है
शहबाज़ शरीफ़ ने बुधवार को चेतावनी दी कि 1960 की संधि का कोई भी उल्लंघन 'युद्ध की कार्रवाई' माना जाएगा। यह संधि छह नदियों को कैसे बांटती है, भारत ने अप्रैल 2025 में इसे क्यों रोका, हेग के न्यायाधिकरण ने तब से क्या कहा है, और ज़मीन पर भारत असल में कितना बदल सकता है।
संक्षेप में
सिंधु जल संधि पर 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हस्ताक्षर हुए थे। इसके तहत सिंधु प्रणाली की तीन पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को और तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का ज़्यादातर पानी पाकिस्तान को मिला, जबकि भारत को रन-ऑफ-द-रिवर पनबिजली जैसे सीमित इस्तेमाल की छूट है। 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद भारत ने संधि को 'स्थगित' कर दिया और कहा है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का साथ नहीं छोड़ता, यह स्थिति बनी रहेगी। हेग के मध्यस्थता न्यायालय ने तब से कहा है कि संधि अब भी बाध्यकारी है और भारत को पश्चिमी नदियों का पानी बहने देना होगा, लेकिन भारत इस न्यायालय को मान्यता नहीं देता और इसके फैसलों को अमान्य बताता है।
सिंधु जल संधि क्या है?
यह 1960 का वह समझौता है जो सिंधु घाटी की नदियों को भारत और पाकिस्तान के बीच बांटता है।
1947 में बंटवारे के साथ सीमा उन नहरों और नदियों के आर-पार खिंच गई जो पंजाब के खेतों को सींचती थीं। बरसों की खींचतान के बाद दोनों देशों ने 1960 में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें विश्व बैंक मध्यस्थ भी था और हस्ताक्षरकर्ता भी।
संधि हर नदी का पानी बांटने के बजाय प्रणाली की छह नदियों को ही बांट देती है। भारत को तीन पूर्वी नदियां, रावी, ब्यास और सतलुज, लगभग बिना रोक-टोक इस्तेमाल के लिए मिलीं। पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियों, सिंधु, झेलम और चिनाब, का ज़्यादातर पानी मिला, जिनमें कहीं ज़्यादा पानी बहता है और जिन पर उसकी ज़्यादातर सिंचित खेती टिकी है। आम तौर पर कहा जाता है कि प्रणाली के कुल बहाव का लगभग चार-पांचवां हिस्सा पाकिस्तान के हिस्से आता है।
क्या भारत पश्चिमी नदियों का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं कर सकता?
कर सकता है, पर सीमित ढंग से। भारत घरेलू ज़रूरतों और कुछ सिंचाई के लिए पानी ले सकता है और रन-ऑफ-द-रिवर पनबिजली संयंत्र बना सकता है, जो बड़ी मात्रा में पानी रोके बिना बहाव से बिजली बनाते हैं। संधि ऐसे संयंत्रों के डिज़ाइन पर बारीक सीमाएं तय करती है, जैसे वे कितना पानी जमा रख सकते हैं (जिसे पॉन्डेज कहते हैं), और उनके आउटलेट व स्पिलवे कहां हों।
संधि के तहत लगभग हर झगड़ा इन्हीं सीमाओं को लेकर रहा है। पाकिस्तान ने झेलम की एक सहायक नदी पर भारत की किशनगंगा परियोजना और चिनाब पर रतले परियोजना पर आपत्ति जताई, दोनों जम्मू-कश्मीर में हैं। उसका तर्क है कि इनके डिज़ाइन से भारत को बहाव पर ज़रूरत से ज़्यादा नियंत्रण मिल जाता है।
विवाद कैसे सुलझाए जाने थे?
तीन सीढ़ियों वाली व्यवस्था से। तकनीकी सवाल पहले स्थायी सिंधु आयोग में जाते हैं, जिसमें दोनों देशों का एक-एक आयुक्त होता है। किसी “मतभेद” को तटस्थ विशेषज्ञ के पास भेजा जा सकता है। पूरा “विवाद” मध्यस्थता न्यायालय में जा सकता है।
किशनगंगा और रतले पर पाकिस्तान ने मध्यस्थता न्यायालय मांगा, जबकि भारत ने तटस्थ विशेषज्ञ। 2022 में दोनों का गठन हुआ। भारत ने सिर्फ तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया में हिस्सा लिया और न्यायालय को मान्यता देने से इनकार किया, यह कहते हुए कि संधि के मुताबिक पहले तटस्थ विशेषज्ञ का रास्ता अपनाना ज़रूरी है।
अप्रैल 2025 में भारत ने क्या किया?
संधि को “स्थगित” कर दिया। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए, जिसके लिए भारत ने पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया। इसके बाद नई दिल्ली ने संधि को स्थगित रखने का ऐलान किया। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान विश्वसनीय और सत्यापन योग्य ढंग से सीमा पार आतंकवाद का समर्थन बंद नहीं करता, यह स्थिति बनी रहेगी।
पाकिस्तान हमले में किसी भूमिका से इनकार करता है और कहता है कि संधि में किसी भी पक्ष को इसे निलंबित करने का प्रावधान ही नहीं है। वह इस कदम को अपनी खाद्य और जल सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।
तब से हेग के न्यायालय ने क्या कहा है?
कि संधि अब भी भारत पर बाध्यकारी है। जून 2025 में मध्यस्थता न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्र पर एक पूरक फैसला दिया, और 8 अगस्त 2025 को संधि की सामान्य व्याख्या पर फैसला सुनाया। उसने कहा कि भारत को आम तौर पर पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान की ओर “बहने देना” होगा, पनबिजली के लिए दी गई छूट को सख्ती से पढ़ा जाना चाहिए, और रन-ऑफ-द-रिवर संयंत्रों के डिज़ाइन पर दिशानिर्देश दिए। किशनगंगा और रतले पर उसने अभी फैसला नहीं दिया। भारत के संयंत्र अधिकतम कितना पानी रोक सकते हैं, इस पर एक और फैसला 15 मई 2026 को आया।
भारत ने इनमें से हर फैसले को खारिज किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 16 मई को कहा, “भारत इस तथाकथित फैसले को स्पष्ट रूप से खारिज करता है।” उन्होंने कहा, “इसकी ओर से जारी कोई भी कार्यवाही, फैसला या निर्णय अमान्य है। सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का भारत का निर्णय लागू है।”
पहलगाम हमले के बाद से संधि
- 22 अप्रैल 2025पहलगाम में 26 लोग मारे गए; भारत ने संधि स्थगित की
- जून 2025मध्यस्थता न्यायालय का अपने अधिकार क्षेत्र पर पूरक फैसला; भारत ने खारिज किया
- 8 अगस्त 2025सामान्य व्याख्या पर फैसला: भारत पश्चिमी नदियों का पानी 'बहने दे'
- 15 मई 2026अधिकतम पॉन्डेज पर फैसला; भारत ने अमान्य बताया
- 21 अक्टूबर 2026शहबाज़ शरीफ़ बोले, कोई भी उल्लंघन युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा
पाकिस्तान अभी चेतावनी क्यों दे रहा है?
क्योंकि उसका कहना है कि ऊपर की ओर से असर दिखने लगा है। बुधवार को इस्लामाबाद में मालदीव के राष्ट्रपति के साथ बोलते हुए शहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि पानी पाकिस्तान के लिए “रेड लाइन” है और “इस मामले में कोई भी उल्लंघन पाकिस्तान युद्ध की कार्रवाई मानेगा।” पाकिस्तानी अधिकारियों ने हाल के हफ्तों में नदियों के बहाव में असामान्य उतार-चढ़ाव की बात कही है और भारत पर जलाशय और पानी मोड़ने की परियोजनाएं आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है, हालांकि इस्लामाबाद ने परियोजनाओं के नाम नहीं बताए। नई दिल्ली की ओर से तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
क्या भारत सचमुच पानी रोक सकता है?
जल्दी नहीं, और ज़्यादा भी नहीं। पश्चिमी नदियों पर भारत के पास बड़े भंडारण बहुत कम हैं, और रन-ऑफ-द-रिवर संयंत्र पानी रोकने के लिए नहीं, आगे बहाने के लिए बने होते हैं। कम समय में भारत सिर्फ समय बदल सकता है, जैसे जलाशय कब भरे या खाली किए जाएं, और यह कि बहाव और बाढ़ के बारे में कितनी जानकारी साझा की जाए। पानी का बड़ा हिस्सा मोड़ने लायक बांध और नहरें बनाने में कई साल लगेंगे।
इसीलिए यह विवाद पानी की मात्रा जितना ही भरोसे और आंकड़ों का भी है। पाकिस्तान के लिए बुवाई के मौसम में चिनाब या झेलम के बहाव में छोटे उतार-चढ़ाव भी खेतों तक महसूस होते हैं। भारत के लिए यह संधि उन गिने-चुने दबावों में से एक बन गई है जो उसके पास उस पड़ोसी पर हैं जिस पर वह आतंक को बढ़ावा देने का आरोप लगाता है। दोनों में से किसी ने भी अपना रुख छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया है।
मूल दस्तावेज़
- PCA Press Release: Decision on Pakistan's Request for Clarification, November 10, 2025 (Pakistan v. India, PCA Case 2023-01)Permanent Court of Arbitration (via italaw), 10 नवंबर 2025