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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय का डेटा मांगने वाला गाजियाबाद पुलिस का नोटिस सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया

पुलिस ने कथित रोड रेज की घटना से पहले के तीन महीनों का अकाउंट डेटा मांगा था। अदालत ने इसे जरूरत से ज्यादा बताया और जुटाई गई जानकारी के इस्तेमाल पर रोक लगा दी।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
सुप्रीम कोर्ट की इमारत
सुप्रीम कोर्ट की इमारतPhoto: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. अदालत ने एक्स को भेजा वह नोटिस रद्द किया जिसमें कथित घटना से पहले के तीन महीनों का अकाउंट डेटा मांगा गया था।
  2. पीठ ने आदेश दिया कि नोटिस से मिली कोई भी जानकारी उपाध्याय के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होगी।
  3. गिरफ्तारी से उनकी अंतरिम सुरक्षा स्थायी कर दी गई, और जब्त कार दो दिन में लौटानी होगी।

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने बुधवार को गाजियाबाद पुलिस का वह नोटिस रद्द कर दिया, जिसमें एक्स से पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के अकाउंट का कई महीनों का डेटा मांगा गया था। अदालत ने आदेश दिया कि इसके जरिए जुटाई गई कोई भी जानकारी उनके खिलाफ इस्तेमाल नहीं की जा सकती।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के सामने सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा, “कथित घटना की तारीख से 3 महीने पहले तक का डेटा जब्त करना जरूरत से कहीं ज्यादा लगता है।”

मामला क्या है

उपाध्याय एक खोजी पत्रकार हैं, जिन्होंने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट को मिले दान के कथित दुरुपयोग पर रिपोर्टिंग की थी। इंदिरापुरम थाने में दर्ज एक एफआईआर में उन पर आरोप है कि उन्होंने शिप्रा मॉल के पास अपनी कार से एक मोटरसाइकिल सवार को टक्कर मारी, शिकायतकर्ता को धमकाया और जातिसूचक टिप्पणियां कीं। वे आरोपों से इनकार करते हैं और कहते हैं कि यह घटना उनकी रिपोर्टिंग का बदला लेने के लिए रची गई।

इसके बाद पुलिस ने एक्स को पत्र लिखकर उनके लॉगिन और लॉगआउट आईपी पते, ईमेल आईडी, आईएमईआई नंबर और रजिस्ट्रेशन लॉग मांगे, जो घटना से करीब तीन महीने पहले तक के थे। गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त ने अदालत में हलफनामा देकर कहा कि नोटिस का मकसद उनका पता लगाकर उन्हें गिरफ्तार करना था। पीठ ने पाया कि यह सफाई नोटिस में मांगी गई बातों से मेल नहीं खाती।

अदालत का आदेश

पीठ ने कहा कि कथित घटना से पहले की अवधि के लिए कोई गोपनीय या निजी जानकारी नहीं मांगी जा सकती, और एफआईआर के बाद की अवधि के लिए भी यह तभी मांगी जा सकती है जब दूसरे उपाय नाकाफी हों। अदालत ने 25 अगस्त को मिली दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा को स्थायी कर दिया, बशर्ते उपाध्याय जांच में सहयोग करें, और पुलिस को उनकी जब्त गाड़ी दो दिन में छोड़ने का निर्देश दिया।

अदालत ने एफआईआर पर खुद कोई राय नहीं दी और उपाध्याय को इसे हाईकोर्ट में चुनौती देने की छूट दी। उनकी ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रदीप राय ने पुलिस के डिजिटल डेटा जब्त करने के तरीके पर दिशानिर्देश भी मांगे थे। पीठ ने कहा कि यह सवाल केंद्र सरकार को पक्षकार बनाकर किसी उपयुक्त याचिका में उठाया जाए।