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सीजेआई सूर्यकांत ने लेह में हाईकोर्ट बेंच का उद्घाटन किया, लद्दाख के मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक दिन तय

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लेह और कारगिल के वकील वीडियो लिंक से सुप्रीम कोर्ट में बहस कर सकेंगे। करीब एक सदी बाद लद्दाख को अपनी हाईकोर्ट बेंच मिली है।

संपादकीय डेस्क से · लेहप्रकाशित
लेह शहर और लद्दाख के पहाड़ (फ़ाइल फ़ोटो)
लेह शहर और लद्दाख के पहाड़ (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Bernard Gagnon / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने रविवार को लेह में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट की लद्दाख बेंच का उद्घाटन किया।
  2. लद्दाख से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के सभी मामले एक ही दिन सूचीबद्ध होंगे और वीडियो लिंक से सुने जाएंगे।
  3. बेंच की पहली बैठकें 21 से 23 अक्टूबर तक होंगी, जिनमें 105 मामले पहले ही सूचीबद्ध हैं।

करीब एक सदी तक लद्दाख के लोगों को हाईकोर्ट में अपने मामले की सुनवाई के लिए महान हिमालय पार करना पड़ता था। रविवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत अदालत को उनके पास ले आए।

लेह के मेलोंगथांग में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट की लद्दाख बेंच का उद्घाटन करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि देश की सबसे बड़ी अदालत से इस क्षेत्र की दूरी भी जल्द घटेगी। नई बेंच में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा तैयार होते ही लेह और कारगिल के वकील लद्दाख छोड़े बिना सुप्रीम कोर्ट में बहस कर सकेंगे, और इस क्षेत्र के सभी मामले एक ही दिन सूचीबद्ध होकर रोजाना सुने जाएंगे।

उन्होंने कहा, “इस तरह लद्दाख के लोगों और देश की सर्वोच्च अदालत के बीच दूरी अब बाधा नहीं बनेगी।”

‘सिर्फ पहुंची नहीं, जड़ें जमाईं’

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि 2019 में लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने पर हाईकोर्ट के नाम में उसका नाम जोड़ना एक अहम कदम था, लेकिन वह काफी हद तक प्रतीकात्मक था। उन्होंने कहा, “अदालत के लेटरहेड पर नाम होना और अपने दरवाजे पर अदालत होना एक बात नहीं है।”

उन्होंने कहा, “करीब एक सदी तक लद्दाख की सेवा करने वाला हाईकोर्ट महान हिमालय के उस पार बैठता था, जहां सर्दियों में सिर्फ हवाई रास्ते से पहुंचा जा सकता था।” उन्होंने याद दिलाया कि लेह में 1870 में ही एक विशेष अदालत बनाई गई थी। उन्होंने कहा कि उन्हें बताया गया है कि करीब 3,500 मीटर की ऊंचाई पर बनी यह बेंच भारत में अब तक किसी भी हाईकोर्ट की सबसे ऊंची बैठक है।

उन्होंने जोर दिया कि यह बेंच केंद्र शासित प्रदेश के दोनों जिलों, लेह और कारगिल की बराबर है और अपना मकसद तभी पूरा करेगी जब पूरे लद्दाख के लोग इसे अपना मानेंगे। उन्होंने कहा, “न्याय तक पहुंच अदालत के परिसर से नहीं, वादी के दरवाजे से शुरू होती है।” उन्होंने यह भी कहा, “इतनी लंबी दूरियों वाली धरती पर तकनीक वह कर सकती है जो कोई सड़क कभी नहीं कर सकी।”

मुख्य न्यायाधीश ने तकनीक और कानूनी सहायता को इस दूरी को पाटने के दो औजार बताया और कानूनी जागरूकता शिविरों, पैरा-लीगल स्वयंसेवकों, सस्ते वकीलों, लोक अदालतों और अपराध पीड़ितों को समय पर मुआवजे की जरूरत बताई। उन्होंने इस क्षेत्र में विवाद सुलझाने में ग्राम संस्थाओं और पारंपरिक प्रथाओं की भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “जब वह दिन आएगा, तब हम जानेंगे कि यह बेंच सिर्फ लद्दाख पहुंची नहीं, बल्कि यहां जड़ें जमा चुकी है।”

कौन-कौन मौजूद रहा

सुप्रीम कोर्ट के जज एम एम सुंदरेश, पी एस नरसिम्हा और अरुण पल्ली, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीव कुमार, सिंधु शर्मा और रजनेश ओसवाल मौजूद थे। उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने बेंच को “इस क्षेत्र में न्याय तक पहुंच मजबूत करने में ऐतिहासिक मील का पत्थर” बताया।

यह बेंच कागज रहित अदालत के रूप में बनाई गई है, जिसमें ई-फाइलिंग पोर्टल, दस्तावेज प्रबंधन प्रणाली, डिजिटाइजेशन केंद्र और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कक्ष है। मुख्य न्यायाधीश ने हाईकोर्ट का ऑनलाइन भर्ती पोर्टल भी शुरू किया और 11 जगहों पर सौर ऊर्जा प्रणाली का काम शुरू कराया।

इसी हफ्ते पहले मामले

हाईकोर्ट के 14 अक्टूबर के नोटिस के अनुसार बेंच बुधवार, 21 अक्टूबर से शुक्रवार, 23 अक्टूबर तक पहली बार बैठेगी, और 105 मामले पहले ही सूचीबद्ध हैं। अब तक लद्दाख के वादियों को श्रीनगर या जम्मू जाना पड़ता था।