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सीजेपी के सौरव दास और आशुतोष रांका ने हाई कोर्ट से याचिका वापस ली, अब मजिस्ट्रेट पर नज़र

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कॉकरोच जनता पार्टी के दोनों नेताओं से कहा कि उनका उपाय पुनरीक्षण में है और जमानतदारों पर दोपहर की सुनवाई का इंतज़ार करने की सलाह दी।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
दिल्ली हाई कोर्ट में वकील (फाइल फोटो) (फ़ाइल फ़ोटो)
दिल्ली हाई कोर्ट में वकील (फाइल फोटो) (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Kamlesh.legalaid / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. सौरव दास और आशुतोष रांका ने हिरासत बढ़ाए जाने के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट से याचिका वापस ले ली।
  2. जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि उनका उपाय पुनरीक्षण में है, रिट में नहीं।
  3. हिरासत खत्म होने पर दोनों को दोपहर 2 बजे विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना था।

जेल में बंद कॉकरोच जनता पार्टी के दो नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका ने बुधवार को अपनी न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में दायर याचिका वापस ले ली। न्यायाधीश ने सुझाव दिया था कि बेहतर होगा वे उसी दोपहर मजिस्ट्रेट की सुनवाई का इंतज़ार करें।

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने सवाल किया कि वे हाई कोर्ट आए ही क्यों। उन्होंने पूछा, “अगर आदेश पुनरीक्षण योग्य है तो अनुच्छेद 226 के तहत क्यों आए? आपका उपाय असल में पुनरीक्षण में है।” उन्होंने वकील को आगाह किया, “आप अदालत को एक ऐसी बहस में खींच रहे हैं जो शायद आखिर में आपके पक्ष में न जाए,” और ध्यान दिलाया कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट दोपहर 2 बजे उनके जमानतदारों पर फिर विचार करने वाले हैं।

न्यायाधीश ने कहा, “क्या यह बेहतर नहीं होगा कि आप इसे वापस लें और देखें कि 2 बजे क्या होता है। मान लीजिए आज 4 बजे तक चीज़ें आपके पक्ष में हो जाएं, तो सब खत्म।”

उनके वकील अभिक चिमनी ने दलील दी थी कि 19 अक्टूबर का मजिस्ट्रेट का आदेश बुनियादी तौर पर गलत है क्योंकि उस अदालत को हिरासत बढ़ाने का अधिकार ही नहीं था, और आदेश में जमानतदारों की स्थिति भी गलत दर्ज की गई। उन्होंने अदालत से कहा, “आदेश में लिखा है कि कोई दूसरा जमानतदार मौजूद नहीं है।” थोड़े विराम के बाद उन्होंने याचिका वापस लेने का फैसला किया। न्यायाधीश ने इसकी अनुमति दी और कहा कि वे मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दे रहे हैं।

दोनों 13 अक्टूबर से हिरासत में हैं, जब वे जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के एक दिन बाद उसका गेट फांद गए थे। सोमवार को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट रितु राज ने उनके जमानतदार नामंज़ूर कर हिरासत बुधवार तक बढ़ा दी थी और कहा था कि उनका आचरण “कानून के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाता।” बुधवार दोपहर की सुनवाई का नतीजा लगभग 3:45 बजे तक सार्वजनिक नहीं हुआ था।

इसी न्यायाधीश ने आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर भी जल्द सुनवाई की मंज़ूरी दी। बोरा ने पुलिस के उस नोटिस को चुनौती दी है जिसमें उनसे पूछा गया है कि “शांति बनाए रखने” के लिए ₹10,000 का बॉन्ड भरने का आदेश उन पर क्यों न दिया जाए। उन्हें 16 अक्टूबर को पार्टी के “लहरा दो तिरंगा” मार्च में जाते समय हिरासत में लिया गया था और अगले दिन छोड़ दिया गया।

सीजेपी की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने मंगलवार को एक्स पर लिखा था, “सौरव और आशुतोष को एक मिनट भी सलाखों के पीछे नहीं रहना चाहिए।”