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सितंबर में खुदरा महंगाई क्यों उछली, और आपकी ईएमआई पर इसका क्या असर होगा

प्याज, लहसुन और चांदी ने इस साल की सबसे तेज़ महंगाई को हवा दी। अर्थशास्त्रियों को अब दिसंबर में आरबीआई की एक और दर बढ़ोतरी की उम्मीद है, जो कुछ महीनों में होम लोन तक पहुंच जाएगी।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

सितंबर में खुदरा महंगाई अगस्त के 4.83% से बढ़कर 5.54% हो गई। इसकी मुख्य वजह खाने-पीने की चीज़ें रहीं, और प्याज का दाम एक साल पहले के दोगुने से भी ज़्यादा हो गया। आरबीआई ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% किया था और कई अर्थशास्त्री दिसंबर में एक और बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे हैं। ज़्यादातर नए फ्लोटिंग रेट होम लोन रेपो रेट से जुड़े हैं और उन्हें कम से कम हर तीन महीने में रीसेट करना होता है, इसलिए अगली बढ़ोतरी एक तिमाही के भीतर ईएमआई में दिखेगी।

महंगाई कितनी बढ़ी?

सितंबर में खुदरा महंगाई अगस्त के 4.83% से बढ़कर 5.54% हो गई, जो 2026 में अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने ये अस्थायी आंकड़े 12 अक्टूबर को जारी किए। इस साल हर महीने महंगाई बढ़ी है, जनवरी में यह 2.74% थी।

मुख्य आंकड़ा अब भी भारतीय रिज़र्व बैंक की 2% से 6% की सहनशील सीमा के भीतर है। लेकिन यह आरबीआई के 4% के लक्ष्य से काफी ऊपर है, और लगातार चौथे महीने उससे ऊपर रहा।

कीमतें किस वजह से बढ़ीं?

सबसे बड़ा हाथ खाने-पीने की चीज़ों का रहा। उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक से मापी जाने वाली खाद्य महंगाई अगस्त के 5.97% से उछलकर 7.74% हो गई।

सबसे आगे प्याज रहा। इसकी कीमत एक साल पहले से 108.09% ज़्यादा थी, जबकि अगस्त में यह बढ़ोतरी 48.78% थी। अदरक 62.85%, लहसुन 54.62% और नींबू 36.41% महंगे हुए। कुछ चीज़ें सस्ती भी हुईं: आलू एक साल पहले से 11.50% और टमाटर 8.62% सस्ता रहा।

रसोई के बाहर, चांदी के गहने एक साल पहले से 87.80% महंगे थे, और बाहर खाना और होटल में ठहरना 9.36% महंगा हुआ। बैंक ऑफ बड़ौदा के अनुमान के मुताबिक, खाने और ईंधन को छोड़कर मापी जाने वाली कोर महंगाई 4.3% रही।

गांवों पर ज़्यादा असर क्यों?

सितंबर में ग्रामीण महंगाई 6.08% रही, जबकि शहरों में 4.88%। गांवों में घर के खर्च का बड़ा हिस्सा खाने पर जाता है, और ग्रामीण खाद्य महंगाई 8.06% पर पहुंच गई, जबकि शहरी इलाकों में यह 7.18% रही। ग्रामीण और शहरी महंगाई का फ़र्क अगस्त के 0.93 से बढ़कर 1.20 प्रतिशत अंक हो गया।

बड़े राज्यों में तमिलनाडु में महंगाई सबसे ज़्यादा 6.81% रही, जहां खाने-पीने की कीमतें 10.62% बढ़ीं। इसके बाद ओडिशा (6.70%), मध्य प्रदेश (6.68%) और तेलंगाना (6.64%) रहे।

सितंबर में महंगाई की सबसे ज़्यादा मार कहांसालाना आधार पर, सितंबर 2026 (%)
सितंबर में महंगाई की सबसे ज़्यादा मार कहां. सालाना आधार पर, सितंबर 2026 (%)
मदमान
अखिल भारतीय5.54%
खाद्य (सीएफपीआई)7.74%
ग्रामीण6.08%
शहरी4.88%
ग्रामीण खाद्य8.06%
शहरी खाद्य7.18%

क्या आरबीआई फिर दरें बढ़ाएगा?

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हां, 2 से 4 दिसंबर की अगली नीति बैठक में। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% किया था, जो फरवरी 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी थी। समिति का अनुमान है कि जुलाई-सितंबर में महंगाई औसतन 4.9% रहेगी, अक्टूबर-दिसंबर में 6.0% के शिखर पर पहुंचेगी और जनवरी-मार्च में घटकर 5.7% होगी।

सितंबर का आंकड़ा इसी रास्ते पर है, लेकिन आगे की तस्वीर मुश्किल होती दिख रही है। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत ने कहा कि अक्टूबर 2025 के प्रतिकूल आधार प्रभाव की वजह से अक्टूबर 2026 में खाद्य महंगाई 9.1% तक जा सकती है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, “इसलिए हमारा यह मत कायम है कि दिसंबर में एक और दर बढ़ोतरी की ज़रूरत होगी।” डीबीएस बैंक की राधिका राव को उम्मीद है कि आरबीआई “दिसंबर 2026 में एक और दर बढ़ोतरी का रास्ता खुला रखेगा।”

अर्थशास्त्री जिन बड़े जोखिमों का ज़िक्र कर रहे हैं, वे हैं 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कच्चा तेल, कमज़ोर मानसून और पश्चिम एशिया का संघर्ष।

मेरी ईएमआई पर इसका क्या मतलब है?

अगर आपका होम या कार लोन फ्लोटिंग रेट पर है और रेपो रेट से जुड़ा है, तो हर 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी अगले रीसेट पर आपकी ब्याज दर उतनी ही बढ़ा देती है। अक्टूबर 2019 से बैंकों को नए फ्लोटिंग रेट रिटेल लोन रेपो रेट जैसे बाहरी बेंचमार्क से जोड़ने होते हैं और उन्हें कम से कम हर तीन महीने में रीसेट करना होता है। इसलिए 7 अक्टूबर की बढ़ोतरी जनवरी की शुरुआत तक ऐसे ज़्यादातर लोन तक पहुंच जाएगी, और दिसंबर में बढ़ोतरी हुई तो वह उसके बाद एक तिमाही के भीतर असर दिखाएगी।

उदाहरण के लिए, 20 साल के ₹50 लाख के लोन पर 8.00% की मानी गई दर से ईएमआई लगभग ₹41,822 बनती है। 8.25% पर यह लगभग ₹42,603 हो जाती है, यानी हर महीने ₹781 ज़्यादा। दूसरी बढ़ोतरी से दर 8.50% हुई तो ईएमआई लगभग ₹43,391 होगी। कई बैंक ईएमआई बढ़ाने की जगह लोन की अवधि बढ़ा देते हैं, इसलिए अपने बैंक से पूछ लें कि आपके लोन पर कौन सा विकल्प लागू है। नियमों का ब्योरा हमारे रेपो रेट वाले लेख में है।

कर्ज़ लेने वालों को आगे क्या देखना चाहिए?

तीन तारीखें अहम हैं। अक्टूबर की नीति बैठक का ब्योरा (मिनट्स) 21 अक्टूबर को आएगा, जिससे पता चलेगा कि एमपीसी का हर सदस्य महंगाई को लेकर कितना चिंतित है। अक्टूबर की महंगाई का आंकड़ा 12 नवंबर को आएगा; इंडिया रेटिंग्स को इसके करीब 6% रहने का अनुमान है। फिर दिसंबर का नीतिगत फैसला बताएगा कि आरबीआई दोबारा कदम उठाता है या नहीं।

किसी एक कर्ज़दार के लिए, उसके लोन की रीसेट तारीख ही तय करती है कि इनमें से कोई भी बदलाव मासिक किस्त में कब दिखेगा।

मूल दस्तावेज़