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हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद नेहा बोरा बोलीं, आइसा शांति बॉन्ड पर दस्तखत नहीं करेगा
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने 10,000 रुपये के बॉन्ड नोटिस को रद्द करने से इनकार किया, लेकिन मजिस्ट्रेट से कहा कि पहले नोटिस का आधार बनी सामग्री सौंपें। एक दिन बाद आइसा अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे बॉन्ड पर दस्तखत करना असहमति के अधिकार को छोड़ देने जैसा है।

मुख्य बातें
- दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को 10,000 रुपये के शांति बॉन्ड नोटिस के खिलाफ नेहा बोरा की याचिका खारिज की।
- जज ने मजिस्ट्रेट से कहा कि जांच का आदेश देने से पहले उन्हें आधार बनी पूरी सामग्री दें।
- बोरा ने शनिवार को कहा कि आइसा शांति बॉन्ड पर दस्तखत नहीं करेगा और इन्हें चुनौती देता रहेगा।
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने शनिवार को कहा कि उनका संगठन शांति बॉन्ड पर दस्तखत नहीं करेगा। एक दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने उनसे ऐसा करने को कहने वाले नोटिस को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोरा ने कहा, “ऐसे शांति बॉन्ड पर दस्तखत करना हमारे लिए सैद्धांतिक रूप से गलत फैसला है।” उन्होंने कहा, “यह असहमति के हमारे लोकतांत्रिक अधिकार को छोड़ देने से कम नहीं है।”
शुक्रवार शाम जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के 17 अक्टूबर के नोटिस के खिलाफ उनकी चुनौती खारिज कर दी। नोटिस में उनसे जांच चलने तक शांति बनाए रखने के लिए एक जमानतदार के साथ 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड भरने को कहा गया था। जज ने कहा कि “पर्याप्त सुरक्षा उपाय” मौजूद हैं और मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह “ध्यान रखें” कि कोई भी आदेश देने से पहले बोरा को आधार बनी पूरी सामग्री दी जाए। विस्तृत आदेश अभी आना है।
बोरा को 16 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान मंडी हाउस पर हिरासत में लिया गया था और रात भर आर के पुरम थाने में रखा गया था। नोटिस में उन पर नारेबाजी और निषेधाज्ञा के बावजूद जंतर-मंतर के पास बार-बार प्रदर्शन करने का आरोप था।
अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और बोरा ने कभी हिंसा का आह्वान नहीं किया। पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने प्रदर्शनकारियों को “नई दिल्ली के केंद्र में लंपट तत्व” बताया और कहा कि मजिस्ट्रेट उनके खिलाफ दर्ज छह एफआईआर को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
बोरा ने फैसले को मजिस्ट्रेट पर अंकुश के रूप में देखा। उन्होंने कहा, “अदालत ने कहा है कि एसईएम कारण बताओ नोटिस जारी करके (लोगों से) किसी चीज पर दस्तखत नहीं करवा सकते।” उन्होंने कहा, “शांति सिर्फ सरकार के लिए नहीं, जनता के लिए भी होनी चाहिए।” प्रदर्शनों के बारे में उन्होंने कहा, “हिंसा पुलिस की ओर से हुई।”
अब मामला वापस मजिस्ट्रेट के पास है, जिन्हें पहले नोटिस का आधार बनी सामग्री साझा करनी होगी।