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पुलिस के शांति बॉन्ड नोटिस के खिलाफ नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट सुनाएगा फैसला
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने गुरुवार को आइसा अध्यक्ष की वह याचिका सुनी जिसमें मजिस्ट्रेट की ओर से ₹10,000 के बॉन्ड की मांग को चुनौती दी गई है। उन्होंने कहा कि फैसला लिखने के लिए उन्हें समय चाहिए।

मुख्य बातें
- नेहा बोरा ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के उस नोटिस को चुनौती दी है जिसमें शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का निजी बॉन्ड मांगा गया है।
- उनके वकील ने नोटिस को कट एंड पेस्ट बताया और कहा कि उनके आचरण की कोई जांच नहीं हुई।
- सरकार ने अदालत को बताया कि बोरा के खिलाफ छह एफआईआर दर्ज हैं और मजिस्ट्रेट का विवेक बहुत व्यापक है।
दिल्ली हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने गुरुवार को आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा की उस याचिका पर सुनवाई पूरी की, जिसमें पुलिस मजिस्ट्रेट के नोटिस को चुनौती दी गई है। नोटिस में उनसे शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का बॉन्ड भरने को कहा गया था। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि फैसला लिखने के लिए उन्हें समय चाहिए और संकेत दिया कि यह मंगलवार तक आ सकता है।
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की प्रमुख बोरा को 16 अक्टूबर को मंडी हाउस पर हिरासत में लिया गया था, जब छात्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों से जुड़े तिरंगा मार्च के लिए निकले थे। दो दिन बाद एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत उन्हें नोटिस जारी कर ₹10,000 का निजी बॉन्ड मांगा। मजिस्ट्रेट के सामने अगली सुनवाई शनिवार को है।
“हिंसा के लिए कोई उकसावा नहीं”
बोरा की ओर से एडवोकेट अभिक चिमनी के साथ पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत से कहा कि नोटिस एक बने-बनाए ढांचे से नकल किया गया है और यह “पहली नजर में ही संवैधानिक और कानूनी रूप से गलत” है। उन्होंने कहा, “अंतरिम बॉन्ड के लिए भी जांच जरूरी है।” उनकी दलील थी कि बोरा की गतिविधि पूरी तरह शांतिपूर्ण रही: “हिंसा के लिए कोई उकसावा नहीं किया गया, सब कुछ पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा।”
उन्होंने जज से कहा कि कानून दो चरणों में काम करता है। “पहला चरण आधार है, दूसरा चरण जांच,” उन्होंने कहा, और जोड़ा कि बोरा के शांति भंग करने की आशंका पर मजिस्ट्रेट की “कोई राय है ही नहीं”। उनके मुताबिक मामला अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के अधिकार का है, जिन पर सिर्फ सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर रोक लगाई जा सकती है।
“बॉन्ड तो देना पड़ेगा”
सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि याचिका न तो सुनवाई योग्य है और न ही इस पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बीएनएसएस की धारा 126 और 130 को साथ पढ़ना होगा: “126 और 130 साथ चलती हैं। ये अलग-अलग नहीं हैं।” किसी व्यक्ति के शांति भंग करने की आशंका पर उन्होंने कहा, “यह व्यक्तिपरक संतुष्टि है, जितनी व्यापक हो सकती है उतनी।”
शर्मा ने अदालत को बताया कि बोरा के खिलाफ छह एफआईआर दर्ज हैं और नोटिस से अब तक कोई बॉन्ड या दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई है। वह खुद या वकील के जरिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश हो सकती हैं। लेकिन मुख्य सवाल पर वह साफ थे: “बॉन्ड तो देना पड़ेगा।”
अदालत के सवाल
जस्टिस प्रसाद ने कहा कि मजिस्ट्रेट की व्यक्तिपरक संतुष्टि की जांच करने का अदालत का दायरा “बेहद सीमित” है। फिर भी उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या मजिस्ट्रेट ने कोई स्वतंत्र जांच की थी और क्या बोरा के अपराध करने की आशंका किसी विश्वसनीय जानकारी पर टिकी थी। उन्होंने कहा, “एकमात्र सुरक्षा यही है कि कानून की शर्तें पूरी हों,” और नोटिस की तुलना “जांच पूरी होने तक निलंबन” से की।
इस महीने सीईसी विरोधी प्रदर्शनों में शामिल लोगों के खिलाफ शांति बॉन्ड और एहतियाती हिरासत के इस्तेमाल पर दिल्ली की अदालतों में चल रहे कई मामलों में यह एक है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके 17 अक्टूबर को शांति बॉन्ड पर रिहा हुए थे, जबकि पार्टी नेता सौरव दास और आशुतोष रांका बुधवार को इस वादे के बाद रिहा हुए कि जंतर-मंतर जब तक अधिसूचना से बाहर है, वे वहां प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे।