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प्रियंका चतुर्वेदी बोलीं, अपने ही आयुक्तों की आपत्तियों पर चुनाव आयोग चुप; सीईसी को हटाने की मुहिम तेज
शिवसेना (यूबीटी) सांसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को संसद के जरिए हटाने की नई कोशिश का समर्थन किया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला कह चुके हैं कि कोई नया नोटिस नियमों के तहत देखा जाएगा, और गोवा कांग्रेस ने आयोग को एसआईआर रद्द करने के लिए 10 दिन दिए हैं।

मुख्य बातें
- प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि एसआईआर पर सवाल 'खुद चुनाव आयोग के भीतर से उठे हैं'।
- ओम बिरला ने कहा कि सीईसी को हटाने का नया नोटिस नियमों और प्रक्रियाओं के तहत जांचा जाएगा।
- गोवा कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश चोडणकर ने राज्य का एसआईआर रद्द करने के लिए आयोग को 10 दिन दिए।
शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने शुक्रवार को चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि वह तब भी चुप है जब उसके अपने दो सदस्यों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तरीके पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को संसद के जरिए हटाने की नई कोशिश का भी समर्थन किया।
उन्होंने कहा कि अपना बयान जारी करने के बाद से आयोग ने न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की है, न सवालों के जवाब दिए हैं। उन्होंने कहा, “ये चिंताएं खुद चुनाव आयोग के भीतर से आई हैं।” उनका इशारा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की उन आपत्तियों की ओर था जो मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और फॉर्म 6 व 7 के निपटारे से जुड़ी हैं। उन्होंने कहा कि ये मुद्दे सबसे पहले विपक्ष ने नहीं उठाए थे।
हटाने का रास्ता
चतुर्वेदी ने कहा कि सीईसी को हटाने का कोई भी प्रस्ताव संसदीय प्रक्रिया से ही आगे बढ़ना चाहिए, जैसा दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के मामले में हुआ था। उन्होंने उम्मीद जताई कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला नियमों के मुताबिक कदम उठाएंगे।
बिरला गुरुवार को ही अपना रुख साफ कर चुके थे। नई दिल्ली में एक ब्रीफिंग में कुमार के खिलाफ संभावित महाभियोग प्रस्ताव के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “अगर कोई नया नोटिस आता है, तो हम उसे नियमों और प्रक्रियाओं के तहत देखेंगे और जांचेंगे।” उन्होंने जोड़ा कि “लोकतंत्र में हर किसी को अपने विचार रखने का अधिकार है”, लेकिन कहा कि लोकतंत्र में तख्तियों और नारेबाजी की कोई जगह नहीं है।
विपक्ष पहले दो बार कोशिश कर चुका है। हटाने के उसके पहले नोटिस दोनों सदनों में खारिज हो गए थे और दूसरे नोटिस अभी राज्यसभा में लंबित हैं। सीईसी को सिर्फ उसी तरह हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को, जिसके लिए हर सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत चाहिए।
मुहिम को तब नई ताकत मिली जब यह खबर आई कि संधू और जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन एसआईआर फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे उनकी जानकारी के बिना लिए गए। आयोग का कहना है कि अलग-अलग राय उसके विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा है और उसके आदेश कानून के मुताबिक हैं।
चतुर्वेदी ने भाजपा को चेताया कि आज वह विपक्ष के साथ जो कर रही है, वह कल उसके साथ भी हो सकता है। उन्होंने कहा, “जब आप एसआईआर के जरिए उन मतदाताओं को हटाएंगे जो आपके खिलाफ वोट देंगे, तो सवाल उठेंगे।” उन्होंने कहा कि सरकार सिर्फ वोट से बदलनी चाहिए: “हर लोकतंत्र में सरकार बदलना एक प्रक्रिया है। लेकिन यह एक मजबूत चुनाव आयोग के कामकाज पर निर्भर करता है।”
गोवा की 10 दिन की मोहलत
पणजी में गोवा प्रदेश कांग्रेस कमेटी एक कदम आगे गई है। इसके अध्यक्ष गिरीश चोडणकर ने गुरुवार को मुख्य निर्वाचन अधिकारी संजय गोयल को ज्ञापन सौंपकर मांग की कि एसआईआर 10 दिन में वापस लिया जाए, नहीं तो पार्टी हाईकोर्ट जाएगी।
चोडणकर ने कहा कि 1,39,634 नाम, यानी गोवा के करीब 11.84% मतदाता, सूची से हटा दिए गए, कई को बिना नोटिस या सुनवाई के, और यह पुनरीक्षण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21 और 22 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा, “दिशानिर्देश कानून से ऊपर नहीं हो सकते।” न आयोग ने और न गोवा के सीईओ ने इस पर सार्वजनिक रूप से जवाब दिया है।