LokVox

राजनीतिचुनाव आयोग

केरलम विधानसभा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव पारित किया

मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन के प्रस्ताव को वाम मोर्चे का साथ मिला, भाजपा के तीनों विधायकों ने विरोध किया। प्रस्ताव में एसआईआर पर सवाल उठाए गए हैं और चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश को वापस शामिल करने की मांग है।

संपादकीय डेस्क से · तिरुवनंतपुरमप्रकाशित
तिरुवनंतपुरम में केरलम विधानसभा भवन
तिरुवनंतपुरम में केरलम विधानसभा भवनSabu Mampallil / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. केरलम विधानसभा मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव पारित करने वाली पहली राज्य विधानसभा बन गई।
  2. प्रस्ताव का आरोप है कि एसआईआर के दौरान योग्य मतदाताओं के नाम बिना नोटिस के सूची से हटाए गए, और उन्हें बहाल करने की मांग की गई है।
  3. मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ़ संसद हटा सकती है, इसलिए इस प्रस्ताव का राजनीतिक वज़न है, कानूनी असर नहीं।

केरलम विधानसभा ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित कर दिया। यह पहली बार है जब किसी राज्य विधानमंडल ने किसी मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ ऐसा कदम उठाया है।

मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने सत्र के पहले दिन नियम 118 के तहत प्रस्ताव पेश किया। इसे संशोधनों के साथ स्वीकार किया गया। सदन में विपक्ष, यानी वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) ने इसका समर्थन किया, जबकि भाजपा के तीनों विधायकों ने विरोध किया।

प्रस्ताव में क्या है

प्रस्ताव में चुनाव आयोग पर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में गंभीर गड़बड़ियों का आरोप लगाया गया है। इसमें कहा गया है कि योग्य मतदाताओं के नाम बिना स्पष्ट मानदंड और बिना पूर्व सूचना के हटाए गए, और “तकनीकी हेरफेर” के ज़रिये हाशिये के समुदायों, अल्पसंख्यकों, प्रवासी मज़दूरों और युवा मतदाताओं के वोट के अधिकार पर खतरा पैदा हुआ।

प्रस्ताव उन रिपोर्टों का हवाला देता है जिनके मुताबिक सॉफ़्टवेयर के ज़रिये निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के अधिकारों को दरकिनार किया गया, नए मतदाता जोड़ने वाले फ़ॉर्म 6 में निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के खिलाफ़ बदलाव किया गया, और आयोग के ज़्यादातर सदस्यों ने इन फ़ैसलों से असहमति जताई थी। प्रस्ताव के अनुसार नागरिकों को वोट से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 326 का उल्लंघन है।

प्रस्ताव की तीन मांगें हैं: गलत तरीके से हटाए गए योग्य मतदाताओं के नाम बहाल किए जाएं, ज्ञानेश कुमार को हटाने की कार्यवाही शुरू हो, और चुनाव आयुक्तों को चुनने वाली समिति का पुनर्गठन कर उसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश को रखा जाए। मौजूदा कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह तीसरी सीट केंद्रीय कैबिनेट के एक मंत्री को दी गई है।

हमारा रुख बिल्कुल साफ़ है। वोट के अधिकार की रक्षा होनी ही चाहिए।

वी.डी. सतीशन, मुख्यमंत्री, केरलम, एक्स पर, 12 अक्टूबर 2026

सदन में संशोधन

नेता प्रतिपक्ष पिनराई विजयन ने एक मौखिक बदलाव सुझाया, जिसे सरकार ने मान लिया। इसके बाद प्रस्ताव में देश भर में बाहर किए गए मतदाताओं के लिए “लाखों” की जगह “करोड़ों” लिखा गया। साजी चेरियन ने एक संशोधन रखा, जिसमें बाहर किए गए मतदाताओं की संख्या 24 लाख बताई गई और “eci.net” नाम के सॉफ़्टवेयर का ज़िक्र किया गया।

भाजपा विधायक वी. मुरलीधरन ने दो बातें जोड़ने का प्रस्ताव रखा। पहली, कि फ़ॉर्म 6 वाली मीडिया रिपोर्ट को खुद चुनाव आयोग गलत बता चुका है। दूसरी में लिखा था: “हम संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को बदनाम करने की निहित स्वार्थों की कोशिशों की कड़ी निंदा करते हैं।” सरकार ने भाजपा के संशोधन नामंज़ूर कर दिए।

भाजपा सत्र से पहले ही संकेत दे चुकी थी कि वह यह सवाल सत्ताधारी कांग्रेस पर ही पलटेगी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने 9 अक्टूबर को कहा था, “इस विधानसभा की वैधता क्या है? यह अवैध विधानसभा है या वैध?” उनका तर्क था कि अगर कांग्रेस नेता एसआईआर के बाद हुए चुनावों पर शक करते हैं, तो वही शक अप्रैल में चुनी गई इस विधानसभा पर भी लागू होता है, और मुख्यमंत्री को जवाब देना चाहिए या इस्तीफ़ा देना चाहिए।

प्रस्ताव से क्या हो सकता है

किसी राज्य विधानसभा के पास मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का अधिकार नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह ही हटाया जा सकता है, यानी संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव के ज़रिये। ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्षी सांसदों के पहले के नोटिस अप्रैल में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने अस्वीकार कर दिए थे।

तिरुवनंतपुरम में यह मतदान उसी दिन हुआ जिस दिन इंडिया गठबंधन के दलों ने एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के मुद्दे पर दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट तक मार्च की योजना बनाई थी। सोमवार दोपहर तक चुनाव आयोग ने प्रस्ताव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी।

मूल दस्तावेज़