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सुप्रीम कोर्ट में याचिका: पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में हो चुनाव आयोग की समीक्षा

वकील विशाल तिवारी की जनहित याचिका में चुनाव प्रचार में धार्मिक अपीलों पर 'पूर्ण प्रतिबंध' और 48 घंटे में शिकायतों के निपटारे का आदेश देने की भी मांग की गई है।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
नई दिल्ली में भारत का सर्वोच्च न्यायालय (फ़ाइल फ़ोटो)
नई दिल्ली में भारत का सर्वोच्च न्यायालय (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. याचिका में पूर्व सीजेआई या सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति बनाने और छह महीने में रिपोर्ट की मांग है।
  2. इसमें पश्चिम बंगाल के एसआईआर में दायर करीब 38.20 लाख अपीलों का जिक्र है, जिनमें से करीब 1.02 लाख का निपटारा हुआ।
  3. धार्मिक आधार पर वोट मांगने वाले उम्मीदवारों पर अपने आप एफआईआर और अयोग्यता की कार्यवाही की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में मांग की गई है कि भारत के किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाई जाए, जो चुनाव आयोग के कामकाज की जांच कर सुधार सुझाए।

वकील विशाल तिवारी ने यह याचिका केंद्र सरकार और आयोग के खिलाफ दायर की है। इसमें अदालत से यह भी अनुरोध है कि वह आयोग को धार्मिक पहचान, प्रतीकों, सांप्रदायिक अपीलों, संप्रदाय या नफरती भाषण के सहारे होने वाले प्रचार पर “पूर्ण प्रतिबंध” लागू करने का निर्देश दे।

तिवारी चाहते हैं कि समिति में संवैधानिक कानून, चुनाव प्रबंधन, सांख्यिकी, तकनीक, साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण के विशेषज्ञ हों और वह छह महीने में रिपोर्ट दे। समिति आयोग की संख्या और काम के बोझ, फैसले लेने और असहमति दर्ज करने के तरीके, मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण, अपीलें सुनने की क्षमता और डिजिटल प्रणालियों की विश्वसनीयता की पड़ताल करे।

याचिका में क्या आधार हैं

याचिका उन खबरों का हवाला देती है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं, जिन्हें आयोग ने “सामान्य सुझाव” बताया। इसके मुताबिक पश्चिम बंगाल के विशेष गहन पुनरीक्षण में सूची से बाहर हुए लोगों ने करीब 38.20 लाख अपीलें दायर कीं और करीब 1.02 लाख का ही निपटारा हुआ है। याचिका में महाराष्ट्र की मसौदा सूची के उन 2,70,313 मतदाताओं का भी जिक्र है जिनकी उम्र डिफॉल्ट जन्म वर्ष के कारण 101 से 150 साल के बीच दिखाई गई।

याचिका अपने दावों में सावधान है। उसमें कहा गया है, “अपीलों का बकाया अपने आप में इस बात का सबूत नहीं है कि हर नाम हटाना गैरकानूनी था,” और यह भी कि याचिका “किसी राजनीतिक दल या किसी पदाधिकारी के खिलाफ निष्कर्ष नहीं मांगती।” उसकी दलील है कि “संस्थागत स्वतंत्रता सिर्फ संवैधानिक दर्जे से सुरक्षित नहीं होती।”

धार्मिक प्रचार पर याचिका की मांग है कि शिकायतों का फैसला 48 घंटे में हो, और धर्म के आधार पर वोट मांगने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ अपने आप एफआईआर और अयोग्यता की कार्यवाही शुरू हो।

सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं हुई है।