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सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनों की फुटेज सुरक्षित रखने को कहा, पुलिस से निषेधाज्ञा के आदेश मांगे
सीईसी-विरोधी प्रदर्शनों पर कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर अदालत ने केंद्र और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया, और वकीलों से नई याचिकाएं दाखिल न करने की अपील की।

मुख्य बातें
- पुलिस और दूसरी एजेंसियों को प्रदर्शनों की सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल सामग्री सुरक्षित रखनी होगी।
- दिल्ली पुलिस को नई दिल्ली में जमावड़े रोकने वाले बीएनएसएस की धारा 163 के आदेश रिकॉर्ड पर रखने होंगे।
- पहले से 46 मामले लंबित होने पर मुख्य न्यायाधीश ने बार से और याचिकाएं न दाखिल करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने गुरुवार को पुलिस और इसमें शामिल हर एजेंसी को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों की सीसीटीवी फुटेज और दूसरी डिजिटल सामग्री सुरक्षित रखने का आदेश दिया। अदालत ने दिल्ली पुलिस से वे निषेधाज्ञा आदेश भी रिकॉर्ड पर रखने को कहा, जिनके आधार पर राजधानी में जमावड़ों पर रोक लगाई गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने 10 अक्टूबर से प्रदर्शनकारियों, वकीलों और पत्रकारों की हिरासत से जुड़ी याचिकाओं पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 172 को चुनौती देने वाली याचिका पर भी नोटिस जारी हुआ। यह धारा पुलिस को उसके निर्देश न मानने वालों को हिरासत में लेने या हटाने का अधिकार देती है।
मामलों का ढेर तेजी से बढ़ा है। अदालत के सामने अब 46 मामले हैं, और मुख्य न्यायाधीश ने वकीलों से रुकने को कहा। उन्होंने कहा, “हम बार के सदस्यों से गंभीर अपील करते हैं कि वे और याचिकाएं दाखिल न करें।” पीठ ने सॉलिसिटर जनरल के पक्ष और याचिकाकर्ताओं, दोनों से एक-एक नोडल वकील तय करने को कहा, ताकि एक-दूसरे से मिलते मुद्दों को एक साथ लाया जा सके।
जो आदेश सामने नहीं आया
सुनवाई का बड़ा हिस्सा एक ऐसे दस्तावेज पर टिका रहा, जिसे याचिकाकर्ताओं ने कभी देखा ही नहीं। राजनीतिक नेताओं की हिरासत पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करने वाली वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि दिल्ली पुलिस आयुक्त के हलफनामे में न धारा 163 के आदेश हैं और न हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या।
जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि वकील “एक भूत के खिलाफ बहस कर रहे हैं”, क्योंकि शिकायत ही यह है कि आदेश कभी रिकॉर्ड पर रखा नहीं गया। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि किसी भी वकील ने वह आदेश नहीं देखा है। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि जारी किए गए आदेश अधिकारियों के अगले हलफनामों के साथ दाखिल किए जाएं।
पुलिस ने अपने हलफनामे में सार्वजनिक व्यवस्था और 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का हवाला देकर पाबंदियों का बचाव किया। उसने कहा कि प्रदर्शन क्षेत्र से बाहर तक फैले कुछ आदेश बाद में अदालत के 11 अक्टूबर के निर्देशों के मुताबिक वापस ले लिए गए। ये आदेश 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले नई दिल्ली जिले में लागू थे और लिखित अनुमति के बिना पांच या ज्यादा लोगों के जमावड़े, जुलूस और धरने पर रोक लगाते थे।
माफी और अवमानना
10 अक्टूबर को मेट्रो स्टेशन बंद करने से जुड़े अवमानना मामले में मेहता ने दलील दी कि केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की बिना शर्त माफी का मतलब यह नहीं कि सरकार अपने कदमों का बचाव नहीं कर सकती, और माफी मांगना प्रक्रिया का हिस्सा है। पीठ ने कहा कि वह अधिकारियों के माफी मांगने की मीडिया रिपोर्टों के आधार पर नहीं चल रही। दिल्ली मेट्रो की अध्यक्ष डी थारा ने बुधवार को एक हलफनामे में अपनी ओर से माफी मांगी थी।
जंतर-मंतर
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के मामले में अदालत ने तुरंत कोई आदेश देने से इनकार किया, लेकिन अधिकारियों से जवाब मांगा। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि यह फैसला “कथित तौर पर” अदालत के ही निर्देशों पर आधारित बताया गया। मेहता इससे असहमत थे। उन्होंने कहा कि वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों पर विचार के लिए पहले ही एक समिति बनी थी, जिसने विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी।
जस्टिस बागची ने पूछा कि तकनीक के दौर में सत्ता के केंद्र से भौतिक नजदीकी अब भी मायने रखती है या नहीं। वरिष्ठ वकील एन हरिहरन ने जवाब दिया, “इस तर्क से तो कोई केरल से भी प्रदर्शन कर सकता है।” वरिष्ठ वकील मुक्ता गुप्ता ने दलील दी कि प्रदर्शन के अधिकार में कटौती नहीं की जा सकती।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट तक इंडिया गठबंधन के मार्च से जुड़ी एक याचिका पर कांग्रेस और राहुल गांधी को, और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ गठबंधन की याचिका पर भी नोटिस जारी किया।