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महिला पत्रकारों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को बुलाया

एक जज की तबीयत खराब होने से दिल्ली प्रदर्शनों से जुड़े हिरासत और अवमानना के मामले गुरुवार तक टले। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पत्रकारों के आरोपों पर पुलिस को जवाब देना होगा।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
सुप्रीम कोर्ट की इमारत
सुप्रीम कोर्ट की इमारतPhoto: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने महिला पत्रकारों के आरोपों पर जवाब के लिए दिल्ली पुलिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी की मौजूदगी मांगी।
  2. जस्टिस वी मोहना की तबीयत ठीक न होने से प्रदर्शनों से जुड़ी हिरासत और अवमानना याचिकाएं 15 अक्टूबर तक टलीं।
  3. सरकार को अनुपालन रिपोर्ट और अवमानना याचिकाओं पर जवाब के लिए दो दिन और मिले।

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने मंगलवार को दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को अदालत में पेश होकर उन आरोपों पर जवाब देने को कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहीं महिला पत्रकारों के साथ पुलिस ने बदसलूकी और यौन उत्पीड़न किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने जब नेटवर्क ऑफ विमेन इन मीडिया, इंडिया (एनडब्ल्यूएमआई) की याचिका का उल्लेख किया, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “हम चाहेंगे कि कोई वरिष्ठ अधिकारी यहां मौजूद रहे और समझाए।” मामले की सुनवाई गुरुवार, 15 अक्टूबर को प्रदर्शनों से जुड़ी दूसरी याचिकाओं के साथ होगी।

पत्रकारों का क्या कहना है

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ प्रदर्शनों को कवर कर रहीं महिला रिपोर्टरों का कहना है कि प्रेस के रूप में अपनी पहचान बताने के बावजूद उनके साथ धक्का-मुक्की हुई, उन्हें हिरासत में लिया गया और काम करने से रोका गया। 3 अक्टूबर को तीन महिला पत्रकारों ने आरोप लगाया था कि जंतर-मंतर के पास एक प्रदर्शन में हिरासत के दौरान पुलिसकर्मियों ने उनका यौन उत्पीड़न किया। दिल्ली पुलिस का कहना है कि ये शिकायतें जांच के लिए क्राइम ब्रांच को भेज दी गई हैं, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पुलिस आयुक्त से रिपोर्ट मांगी है।

जयसिंह ने अदालत से कहा, “यह खास तौर पर प्रदर्शनों के दौरान यौन उत्पीड़न का सामना करने वाली महिला पत्रकारों से जुड़ा है।” एनडब्ल्यूएमआई चाहता है कि प्रदर्शनों में पत्रकारों के साथ पुलिस के बर्ताव के लिए बाध्यकारी दिशानिर्देश बनें, स्वतंत्र जांच हो और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और सी यू सिंह ने भी इसी तरह की याचिकाओं का उल्लेख किया। इनमें फ्री स्पीच कलेक्टिव की एक अवमानना याचिका भी है, जिसमें आरोप है कि अदालत के पहले के आदेशों का उल्लंघन कर पत्रकारों पर हमला किया गया।

मुख्य मामले दो दिन टले

10 और 11 अक्टूबर की सामूहिक हिरासतों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हो सकी। मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जॉयमाल्य बागची के साथ पीठ में शामिल जस्टिस वी मोहना की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए पक्षकारों ने इन मामलों को गुरुवार को लेने पर सहमति दी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुरोध पर अदालत ने सरकार को मेट्रो और रेल सेवाओं पर अपने पहले के निर्देशों की अनुपालन रिपोर्ट और अवमानना याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिए तब तक का समय दिया। एक अवमानना याचिका में केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली पुलिस आयुक्त और दिल्ली मेट्रो प्रमुख के नाम हैं।

गुरुवार की सूची लंबी है। इसमें राजनीतिक नेताओं की हिरासत पर वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका, 6,000 से ज़्यादा हिरासतों का हवाला देने वाली राजद सांसद मनोज झा की याचिका, वकीलों के साथ बर्ताव पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन की याचिकाएं, और डीवाईएफआई सदस्यों को लेकर राज्यसभा सांसद ए ए रहीम की याचिका शामिल हैं। सोमवार के इंडिया गठबंधन मार्च के बाद अदालत परिसर में जुटी भीड़ पर वकीलों की याचिकाएं भी उसी दिन सुनी जाएंगी।

वकीलों का दबाव जारी

दोपहर 1:15 बजे सुप्रीम कोर्ट के दोनों वकील संगठनों के सदस्य अदालत के मीडिया पार्क में जुटे और उन साथियों के लिए एक मिनट का मौन रखा जिनके साथ, उनके मुताबिक, प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने बदसलूकी की। बेंगलुरु में कर्नाटक हाईकोर्ट के बाहर भी वकीलों ने प्रदर्शन किया।

रविवार की विशेष सुनवाई में जस्टिस बागची और जस्टिस मोहना की पीठ ने कहा था कि किसी को भी “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार” के अलावा हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए, खासकर शांतिपूर्ण और निहत्थे जमावड़ों में शामिल लोगों को, और वकीलों व पत्रकारों को उनका काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए। गुरुवार को पूरी पीठ इन निर्देशों पर सरकार का जवाब सुनेगी।