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प्रदर्शन मामलों की सुनवाई से पहले दिल्ली मेट्रो प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगी
डीएमआरसी का कहना है कि 10 अक्टूबर को 303 में से सिर्फ 45 स्टेशन बंद थे। गुरुवार की सुनवाई से पहले पत्रकारों और एक वकील ने नई याचिकाएं दाखिल की हैं।

मुख्य बातें
- डीएमआरसी की चेयरपर्सन डी थारा ने अवमानना याचिका के जवाब में हलफनामे में बिना शर्त माफी मांगी।
- मेट्रो का कहना है कि 10 अक्टूबर को 303 में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद था, कोई फेरा नहीं घटा।
- दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स और जंतर-मंतर को सूची से हटाने को चुनौती देने वाले एक वकील ने नई याचिकाएं दायर कीं।
दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) की चेयरपर्सन ने 10 अक्टूबर को स्टेशन बंद रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) से “बिना शर्त माफी” मांगी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान हुई सामूहिक हिरासत से जुड़ी याचिकाओं पर अदालत गुरुवार को सुनवाई करने वाली है।
एक अवमानना याचिका के जवाब में दाखिल हलफनामे में डीएमआरसी चेयरपर्सन डी थारा ने कहा कि अदालत के 9 अक्टूबर के निर्देशों का “अक्षरशः और भावना के साथ” पालन किया गया, और अवमानना नोटिस खत्म करने की गुहार लगाई। 11 अक्टूबर को जब अदालत को बताया गया था कि स्टेशन अब भी बंद हैं, तो उसने कहा था कि पहली नजर में अवमानना का मामला बनता है।
मेट्रो का क्या कहना है
हलफनामे का मुख्य दावा यह है कि मेट्रो कभी पूरी तरह बंद नहीं हुई। दिल्ली पुलिस ने 57 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद करने को कहा था, अदालत के दखल के बाद पुलिस ने यह सूची घटाकर 45 कर दी। नेटवर्क के 303 में से बाकी 258 स्टेशन पूरी तरह खुले रहे, और बंद स्टेशनों में से 14 पर, जिनमें राजीव चौक, कश्मीरी गेट और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट शामिल हैं, लाइन बदलने की सुविधा चलती रही।
डीएमआरसी का कहना है कि मेट्रो संचालन की कुल मात्रा में “कोई कमी नहीं” हुई: 271 ट्रेनों ने तय सभी 4,157 फेरे पूरे किए। फिर भी यात्रियों की संख्या घटकर करीब 32 लाख रह गई, जबकि आम दूसरे शनिवार को यह लगभग 58 लाख होती है। मेट्रो ने इसकी वजह प्रदर्शन को बताया, जिसके चलते लोग घर पर रहे। उस दिन रात 10 बजे पाबंदियां हटा ली गईं।
चेयरपर्सन ने यह भी दलील दी कि 9 अक्टूबर के निर्देश डीएमआरसी को सुने बिना दिए गए थे, क्योंकि उसे न नोटिस मिला था और न वह पेश हुई थी, और यह कि याचिकाकर्ताओं ने सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह ठप होने की गलत तस्वीर पेश की।
नई याचिकाएं
बुधवार को दो और याचिकाएं दाखिल हुईं। दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स का कहना है कि 10 और 11 अक्टूबर को प्रदर्शन कवर कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिया गया, उनसे मारपीट की गई, रिकॉर्डिंग से रोका गया और फोन व कैमरे छीने गए। यूनियन ने दिल्ली पुलिस की 5 अक्टूबर की एक एडवाइजरी को चुनौती दी है, जिसके बारे में उसका कहना है कि इसका इस्तेमाल सरकारी मान्यता या प्रेस कार्ड के बिना हर व्यक्ति को लौटाने के लिए किया गया। वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने एक हस्ताक्षरित बयान में कहा है कि पीआईबी कार्ड दिखाने के बावजूद उन्हें हिरासत में लिया गया। यूनियन एक स्वतंत्र, समयबद्ध जांच और फ्रीलांस व डिजिटल पत्रकारों की सुरक्षा चाहती है।
वकील स्वाति सिंह ने दिल्ली पुलिस के 11 अक्टूबर के उस आदेश को चुनौती दी है, जिससे जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया गया। याचिका में कहा गया है, “प्रदर्शन का अधिकार सिर्फ किसी तय भौतिक जगह पर इकट्ठा होने का अधिकार नहीं है।” उसकी दलील है कि यह कदम अदालत के 2018 के उस फैसले से टकराता है, जिसमें जंतर-मंतर और बोट क्लब पर प्रदर्शनों पर पूरी रोक को अस्वीकार्य माना गया था। इसके जल्द सूचीबद्ध होने की उम्मीद है।
अदालत क्या सुनेगी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ के सामने लंबी सूची है: बंदी प्रत्यक्षीकरण और हिरासत से जुड़ी याचिकाएं, वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ अवमानना याचिकाएं, सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के दो संगठनों की शिकायतें, और महिला पत्रकारों की वह याचिका जिस पर मुख्य न्यायाधीश ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को मौजूद रहने को कहा था। सरकार को अनुपालन रिपोर्ट और अवमानना याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिए गुरुवार तक का समय दिया गया था।